291. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

291. पृष्ठ
17 · अल-इसरा
اِلَّا رَحْمَةً مِنْ رَبِّكَۜ اِنَّ فَضْلَهُ كَانَ عَلَيْكَ كَب۪يرًا87
यह तो बस तुम्हारे रब की दयालुता है। वास्तविकता यह है कि उसका तुमपर बड़ा अनुग्रह है
قُلْ لَئِنِ اجْتَمَعَتِ الْاِنْسُ وَالْجِنُّ عَلٰٓى اَنْ يَاْتُوا بِمِثْلِ هٰذَا الْقُرْاٰنِ لَا يَاْتُونَ بِمِثْلِه۪ وَلَوْ كَانَ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ ظَه۪يرًا88
कह दो, "यदि मनुष्य और जिन्न इसके लिए इकट्ठे हो जाएँ कि क़ुरआन जैसी कोई चीज़ लाएँ, तो वे इस जैसी कोई चीज़ न ला सकेंगे, चाहे वे आपस में एक-दूसरे के सहायक ही क्यों न हों।"
وَلَقَدْ صَرَّفْنَا لِلنَّاسِ ف۪ي هٰذَا الْقُرْاٰنِ مِنْ كُلِّ مَثَلٍۘ فَاَبٰٓى اَكْثَرُ النَّاسِ اِلَّا كُفُورًا89
हमने इस क़ुरआन में लोगों के लिए प्रत्येक तत्वदर्शिता की बात फेर-फेरकर बयान की, फिर भी अधिकतर लोगों के लिए इनकार के सिवा हर चीज़ अस्वीकार्य ही रही
وَقَالُوا لَنْ نُؤْمِنَ لَكَ حَتّٰى تَفْجُرَ لَنَا مِنَ الْاَرْضِ يَنْبُوعًاۙ90
और उन्होंने कहा, "हम तुम्हारी बात नहीं मानेंगे, जब तक कि तुम हमारे लिए धरती से एक स्रोत प्रवाहित न कर दो,
اَوْ تَكُونَ لَكَ جَنَّةٌ مِنْ نَخ۪يلٍ وَعِنَبٍ فَتُفَجِّرَ الْاَنْهَارَ خِلَالَهَا تَفْج۪يرًاۙ91
या फिर तुम्हारे लिए खजूरों और अंगूरों का एक बाग़ हो और तुम उसके बीच बहती नहरें निकाल दो,
اَوْ تُسْقِطَ السَّمَٓاءَ كَمَا زَعَمْتَ عَلَيْنَا كِسَفًا اَوْ تَاْتِيَ بِاللّٰهِ وَالْمَلٰٓئِكَةِ قَب۪يلًاۙ92
या आकाश को टुकड़े-टुकड़े करके हम पर गिरा दो जैसा कि तुम्हारा दावा है, या अल्लाह और फ़रिश्तों ही को हमारे समझ ले आओ,
اَوْ يَكُونَ لَكَ بَيْتٌ مِنْ زُخْرُفٍ اَوْ تَرْقٰى فِي السَّمَٓاءِۜ وَلَنْ نُؤْمِنَ لِرُقِيِّكَ حَتّٰى تُنَزِّلَ عَلَيْنَا كِتَابًا نَقْرَؤُ۬هُۜ قُلْ سُبْحَانَ رَبّ۪ي هَلْ كُنْتُ اِلَّا بَشَرًا رَسُولًا۟93
या तुम्हारे लिए स्वर्ण-निर्मित एक घर हो जाए या तुम आकाश में चढ़ जाओ, और हम तुम्हारे चढ़ने को भी कदापि न मानेंगे, जब तक कि तुम हम पर एक किताब न उतार लाओ, जिसे हम पढ़ सकें।" कह दो, "महिमावान है मेरा रब! क्या मैं एक संदेश लानेवाला मनुष्य के सिवा कुछ और भी हूँ?"
وَمَا مَنَعَ النَّاسَ اَنْ يُؤْمِنُٓوا اِذْ جَٓاءَهُمُ الْهُدٰٓى اِلَّٓا اَنْ قَالُٓوا اَبَعَثَ اللّٰهُ بَشَرًا رَسُولًا94
लोगों को जबकि उनके पास मार्गदर्शन आया तो उनको ईमान लाने से केवल यही चीज़ रुकावट बनी कि वे कहने लगे, "क्या अल्लाह ने एक मनुष्य को रसूल बनाकर भेज दिया?"
قُلْ لَوْ كَانَ فِي الْاَرْضِ مَلٰٓئِكَةٌ يَمْشُونَ مُطْمَئِنّ۪ينَ لَنَزَّلْنَا عَلَيْهِمْ مِنَ السَّمَٓاءِ مَلَكًا رَسُولًا95
कह दो, "यदि धरती में फ़रिश्ते आबाद होकर चलते-फिरते होते तो हम उनके लिए अवश्य आकाश से किसी फ़रिश्ते ही को रसूल बनाकर भेजते।"
قُلْ كَفٰى بِاللّٰهِ شَه۪يدًا بَيْن۪ي وَبَيْنَكُمْۜ اِنَّهُ كَانَ بِعِبَادِه۪ خَب۪يرًا بَص۪يرًا96
कह दो, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह ही एक गवाह काफ़ी है। निश्चय ही वह अपने बन्दों की पूरी ख़बर रखनेवाला, देखनेवाला है।"