296. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

296. पृष्ठ
18 · अल-कहफ
وَكَذٰلِكَ اَعْثَرْنَا عَلَيْهِمْ لِيَعْلَمُٓوا اَنَّ وَعْدَ اللّٰهِ حَقٌّ وَاَنَّ السَّاعَةَ لَا رَيْبَ ف۪يهَاۚ اِذْ يَتَنَازَعُونَ بَيْنَهُمْ اَمْرَهُمْ فَقَالُوا ابْنُوا عَلَيْهِمْ بُنْيَانًاۜ رَبُّهُمْ اَعْلَمُ بِهِمْۜ قَالَ الَّذ۪ينَ غَلَبُوا عَلٰٓى اَمْرِهِمْ لَنَتَّخِذَنَّ عَلَيْهِمْ مَسْجِدًا21
इस तरह हमने लोगों को उनकी सूचना दे दी, ताकि वे जान लें कि अल्लाह का वादा सच्चा है और यह कि क़ियामत की घड़ी में कोई सन्देह नहीं है। वह समय भी उल्लेखनीय है जब वे आपस में उनके मामले में छीन-झपट कर रहे थे। फिर उन्होंने कहा, "उनपर एक भवन बना दे। उनका रब उन्हें भली-भाँति जानता है।" और जो लोग उनके मामले में प्रभावी रहे उन्होंने कहा, "हम तो उनपर अवश्य एक उपासना गृह बनाएँगे।"
سَيَقُولُونَ ثَلٰثَةٌ رَابِعُهُمْ كَلْبُهُمْۚ وَيَقُولُونَ خَمْسَةٌ سَادِسُهُمْ كَلْبُهُمْ رَجْمًا بِالْغَيْبِۚ وَيَقُولُونَ سَبْعَةٌ وَثَامِنُهُمْ كَلْبُهُمْۜ قُلْ رَبّ۪ٓي اَعْلَمُ بِعِدَّتِهِمْ مَا يَعْلَمُهُمْ اِلَّا قَل۪يلٌ۠ فَلَا تُمَارِ ف۪يهِمْ اِلَّا مِرَٓاءً ظَاهِرًۖا وَلَا تَسْتَفْتِ ف۪يهِمْ مِنْهُمْ اَحَدًا۟22
अब वे कहेंगे, "वे तीन थे और उनमें चौथा कुत्ता था।" और वे यह भी कहेंगे, "वे पाँच थे और उनमें छठा उनका कुत्ता था।" यह बिना निशाना देखे पत्थर चलाना है। और वे यह भी कहेंगे, "वे सात थे और उनमें आठवाँ उनका कुत्ता था।" कह दो, "मेरा रब उनकी संख्या को भली-भाँति जानता है।" उनको तो थोड़े ही जानते है। तुम ज़ाहिरी बात के सिवा उनके सम्बन्ध में न झगड़ो और न उनमें से किसी से उनके विषय में कुछ पूछो
وَلَا تَقُولَنَّ لِشَا۬يْءٍ اِنّ۪ي فَاعِلٌ ذٰلِكَ غَدًاۙ23
और न किसी चीज़ के विषय में कभी यह कहो, "मैं कल इसे कर दूँगा।"
اِلَّٓا اَنْ يَشَٓاءَ اللّٰهُۘ وَاذْكُرْ رَبَّكَ اِذَا نَس۪يتَ وَقُلْ عَسٰٓى اَنْ يَهْدِيَنِ رَبّ۪ي لِاَقْرَبَ مِنْ هٰذَا رَشَدًا24
बल्कि अल्लाह की इच्छा ही लागू होती है। और जब तुम भूल जाओ तो अपने रब को याद कर लो और कहो, "आशा है कि मेरा रब इससे भी क़रीब सही बात ही ओर मार्गदर्शन कर दे।"
وَلَبِثُوا ف۪ي كَهْفِهِمْ ثَلٰثَ مِائَةٍ سِن۪ينَ وَازْدَادُوا تِسْعًا25
और वे अपनी गुफा में तीन सौ वर्ष रहे और नौ वर्ष उससे अधिक
قُلِ اللّٰهُ اَعْلَمُ بِمَا لَبِثُواۚ لَهُ غَيْبُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ اَبْصِرْ بِه۪ وَاَسْمِعْۜ مَا لَهُمْ مِنْ دُونِه۪ مِنْ وَلِيٍّۘ وَلَا يُشْرِكُ ف۪ي حُكْمِه۪ٓ اَحَدًا26
कह दो, "अल्लाह भली-भाँति जानता है जितना वे ठहरे।" आकाशों और धरती की छिपी बात का सम्बन्ध उसी से है। वह क्या ही देखनेवाला और सुननेवाला है! उससे इतर न तो उनका कोई संरक्षक है और न वह अपने प्रभुत्व और सत्ता में किसी को साझीदार बनाता है
وَاتْلُ مَٓا اُو۫حِيَ اِلَيْكَ مِنْ كِتَابِ رَبِّكَۚ لَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِه۪ وَلَنْ تَجِدَ مِنْ دُونِه۪ مُلْتَحَدًا27
अपने रब की क़िताब, जो कुछ तुम्हारी ओर प्रकाशना (वह्यस) हुई, पढ़ो। कोई नहीं जो उनके बोलो को बदलनेवाला हो और न तुम उससे हटकर क शरण लेने की जगह पाओगे