298. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

298. पृष्ठ
18 · अल-कहफ
وَدَخَلَ جَنَّتَهُ وَهُوَ ظَالِمٌ لِنَفْسِه۪ۚ قَالَ مَٓا اَظُنُّ اَنْ تَب۪يدَ هٰذِه۪ٓ اَبَدًاۙ35
वह अपने हकड में ज़ालिम बनकर बाग़ में प्रविष्ट हुआ। कहने लगा, "मैं ऐसा नहीं समझता कि वह कभी विनष्ट होगा
وَمَٓا اَظُنُّ السَّاعَةَ قَٓائِمَةًۙ وَلَئِنْ رُدِدْتُ اِلٰى رَبّ۪ي لَاَجِدَنَّ خَيْرًا مِنْهَا مُنْقَلَبًا36
और मैं नहीं समझता कि वह (क़ियामत की) घड़ी कभी आएगी। और यदि मैं वास्तव में अपने रब के पास पलटा भी तो निश्चय ही पलटने की जगह इससे भी उत्तम पाऊँगा।"
قَالَ لَهُ صَاحِبُهُ وَهُوَ يُحَاوِرُهُٓ اَكَفَرْتَ بِالَّذ۪ي خَلَقَكَ مِنْ تُرَابٍ ثُمَّ مِنْ نُطْفَةٍ ثُمَّ سَوّٰيكَ رَجُلًاۜ37
उसके साथी ने उससे बातचीत करते हुए कहा, "क्या तू उस सत्ता के साथ कुफ़्र करता है जिसने तुझे मिट्टी से, फिर वीर्य से पैदा किया, फिर तुझे एक पूरा आदमी बनाया?
لٰكِنَّا۬ هُوَ اللّٰهُ رَبّ۪ي وَلَٓا اُشْرِكُ بِرَبّ۪ٓي اَحَدًا38
लेकिन मेरा रब तो वही अल्लाह है और मैं किसी को अपने रब के साथ साझीदार नहीं बनाता
وَلَوْلَٓا اِذْ دَخَلْتَ جَنَّتَكَ قُلْتَ مَا شَٓاءَ اللّٰهُۙ لَا قُوَّةَ اِلَّا بِاللّٰهِۚ اِنْ تَرَنِ اَنَا۬ اَقَلَّ مِنْكَ مَالًا وَوَلَدًاۚ39
और ऐसा क्यों न हुआ कि जब तूने अपने बाग़ में प्रवेश किया तो कहता, 'जो अल्लाह चाहे, बिना अल्लाह के कोई शक्ति नहीं?' यदि तू देखता है कि मैं धन और संतति में तुझसे कम हूँ,
فَعَسٰى رَبّ۪ٓي اَنْ يُؤْتِيَنِ خَيْرًا مِنْ جَنَّتِكَ وَيُرْسِلَ عَلَيْهَا حُسْبَانًا مِنَ السَّمَٓاءِ فَتُصْبِحَ صَع۪يدًا زَلَقًاۙ40
तो आशा है कि मेरा रब मुझे तेरे बाग़ से अच्छा प्रदान करें और तेरे इस बाग़ पर आकाश से कोई क़ुर्क़ी (आपदा) भेज दे। फिर वह साफ़ मैदान होकर रह जाए
اَوْ يُصْبِحَ مَٓاؤُ۬هَا غَوْرًا فَلَنْ تَسْتَط۪يعَ لَهُ طَلَبًا41
या उसका पानी बिलकुल नीचे उतर जाए। फिर तू उसे ढूँढ़कर न ला सके।"
وَاُح۪يطَ بِثَمَرِه۪ فَاَصْبَحَ يُقَلِّبُ كَفَّيْهِ عَلٰى مَٓا اَنْفَقَ ف۪يهَا وَهِيَ خَاوِيَةٌ عَلٰى عُرُوشِهَا وَيَقُولُ يَا لَيْتَن۪ي لَمْ اُشْرِكْ بِرَبّ۪ٓي اَحَدًا42
हुआ भी यही कि उसका सारा फल घिराव में आ गया। उसने उसमें जो कुछ लागत लगाई थी, उसपर वह अपनी हथेलियों को नचाता रह गया. और स्थिति यह थी कि बाग़ अपनी टट्टियों पर हा पड़ा था और वह कह रहा था, "क्या ही अच्छा होता कि मैंने अपने रब के साथ किसी को साझीदार न बनाया होता!"
وَلَمْ تَكُنْ لَهُ فِئَةٌ يَنْصُرُونَهُ مِنْ دُونِ اللّٰهِ وَمَا كَانَ مُنْتَصِرًاۜ43
उसका कोई जत्था न हुआ जो उसके और अल्लाह के बीच पड़कर उसकी सहायता करता और न उसे स्वयं बदला लेने की सामर्थ्य प्राप्त थी
هُنَالِكَ الْوَلَايَةُ لِلّٰهِ الْحَقِّۜ هُوَ خَيْرٌ ثَوَابًا وَخَيْرٌ عُقْبًا۟44
ऐसे अवसर पर काम बनाने का सारा अधिकार परम सत्य अल्लाह ही को प्राप्त है। वही बदला देने में सबसे अच्छा है और वही अच्छा परिणाम दिखाने की स्पष्ट से भी सर्वोत्तम है
وَاضْرِبْ لَهُمْ مَثَلَ الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا كَمَٓاءٍ اَنْزَلْنَاهُ مِنَ السَّمَٓاءِ فَاخْتَلَطَ بِه۪ نَبَاتُ الْاَرْضِ فَاَصْبَحَ هَش۪يمًا تَذْرُوهُ الرِّيَاحُۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ مُقْتَدِرًا45
और उनके समक्ष सांसारिक जीवन की उपमा प्रस्तुत करो, यह ऐसी है जैसे पानी हो, जिसे हमने आकाश से उतारा तो उससे धरती की पौध घनी होकर परस्पर गुँथ गई। फिर वह चूरा-चूरा होकर रह गई, जिसे हवाएँ उड़ाए लिए फिरती है। अल्लाह को तो हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है