302. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

302. पृष्ठ
18 · अल-कहफ
قَالَ اَلَمْ اَقُلْ لَكَ اِنَّكَ لَنْ تَسْتَط۪يعَ مَعِيَ صَبْرًا75
उसने कहा, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि तुम मेरे साथ धैर्य न रख सकोगे?"
قَالَ اِنْ سَاَلْتُكَ عَنْ شَيْءٍ بَعْدَهَا فَلَا تُصَاحِبْن۪يۚ قَدْ بَلَغْتَ مِنْ لَدُنّ۪ي عُذْرًا76
कहा, "इसके बाद यदि मैं आपसे कुछ पूछूँ तो आप मुझे साथ न रखें। अब तो मेरी ओर से आप पूरी तरह उज़ को पहुँच चुके है।"
فَانْطَلَقَا۠ حَتّٰٓى اِذَٓا اَتَيَٓا اَهْلَ قَرْيَةٍۨ اسْتَطْعَمَٓا اَهْلَهَا فَاَبَوْا اَنْ يُضَيِّفُوهُمَا فَوَجَدَا ف۪يهَا جِدَارًا يُر۪يدُ اَنْ يَنْقَضَّ فَاَقَامَهُۜ قَالَ لَوْ شِئْتَ لَتَّخَذْتَ عَلَيْهِ اَجْرًا77
फिर वे दोनों चले, यहाँ तक कि जब वे एक बस्तीवालों के पास पहुँचे और उनसे भोजन माँगा, किन्तु उन्होंने उनके आतिथ्य से इनकार कर दिया। फिर वहाँ उन्हें एक दीवार मिली जो गिरा चाहती थी, तो उस व्यक्ति ने उसको खड़ा कर दिया। (मूसा ने) कहा, "यदि आप चाहते तो इसकी कुछ मज़दूरी ले सकते थे।"
قَالَ هٰذَا فِرَاقُ بَيْن۪ي وَبَيْنِكَۚ سَاُنَبِّئُكَ بِتَاْو۪يلِ مَا لَمْ تَسْتَطِعْ عَلَيْهِ صَبْرًا78
उसने कहा, "यह मेरे और तुम्हारे बीच जुदाई का अवसर है। अब मैं तुमको उसकी वास्तविकता बताए दे रहा हूँ, जिसपर तुम धैर्य से काम न ले सके।"
اَمَّا السَّف۪ينَةُ فَكَانَتْ لِمَسَاك۪ينَ يَعْمَلُونَ فِي الْبَحْرِ فَاَرَدْتُ اَنْ اَع۪يبَهَا وَكَانَ وَرَٓاءَهُمْ مَلِكٌ يَاْخُذُ كُلَّ سَف۪ينَةٍ غَصْبًا79
वह जो नौका थी, कुछ निर्धन लोगों की थी जो दरिया में काम करते थे, तो मैंने चाहा कि उसे ऐबदार कर दूँ, क्योंकि आगे उनके परे एक सम्राट था, जो प्रत्येक नौका को ज़बरदस्ती छीन लेता था
وَاَمَّا الْغُلَامُ فَكَانَ اَبَوَاهُ مُؤْمِنَيْنِ فَخَش۪ينَٓا اَنْ يُرْهِقَهُمَا طُغْيَانًا وَكُفْرًاۚ80
और रहा वह लड़का, तो उसके माँ-बाप ईमान पर थे। हमें आशंका हुई कि वह सरकशी और कुफ़्र से उन्हें तंग करेगा
فَاَرَدْنَٓا اَنْ يُبْدِلَهُمَا رَبُّهُمَا خَيْرًا مِنْهُ زَكٰوةً وَاَقْرَبَ رُحْمًا81
इसलिए हमने चाहा कि उनका रब उन्हें इसके बदले दूसरी संतान दे, जो आत्मविकास में इससे अच्छा हो और दया-करूणा से अधिक निकट हो
وَاَمَّا الْجِدَارُ فَكَانَ لِغُلَامَيْنِ يَت۪يمَيْنِ فِي الْمَد۪ينَةِ وَكَانَ تَحْتَهُ كَنْزٌ لَهُمَا وَكَانَ اَبُوهُمَا صَالِحًاۚ فَاَرَادَ رَبُّكَ اَنْ يَبْلُغَٓا اَشُدَّهُمَا وَيَسْتَخْرِجَا كَنْزَهُمَاۗ رَحْمَةً مِنْ رَبِّكَۚ وَمَا فَعَلْتُهُ عَنْ اَمْر۪يۜ ذٰلِكَ تَاْو۪يلُ مَا لَمْ تَسْطِعْ عَلَيْهِ صَبْرًاۜ۟82
और रही यह दीवार तो यह दो अनाथ बालकों की है जो इस नगर में रहते है। और इसके नीचे उनका ख़जाना मौजूद है। और उनका बाप नेक था, इसलिए तुम्हारे रब ने चाहा कि वे अपनी युवावस्था को पहुँच जाएँ और अपना ख़जाना निकाल लें। यह तुम्हारे रब की दयालुता के कारण हुआ। मैंने तो अपने अधिकार से कुछ नहीं किया। यह है वास्तविकता उसकी जिसपर तुम धैर्य न रख सके।"
وَيَسْـَٔلُونَكَ عَنْ ذِي الْقَرْنَيْنِۜ قُلْ سَاَتْلُوا عَلَيْكُمْ مِنْهُ ذِكْرًاۜ83
वे तुमसे ज़ुलक़रनैन के विषय में पूछते हैं। कह दो, "मैं तुम्हें उसका कुछ वृतान्त सुनाता हूँ।"