303. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
18 · अल-कहफ
اِنَّا مَكَّنَّا لَهُ فِي الْاَرْضِ وَاٰتَيْنَاهُ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ سَبَبًاۙ84
हमने उसे धरती में सत्ता प्रदान की थी और उसे हर प्रकार के संसाधन दिए थे
فَاَتْبَعَ سَبَبًا85
अतएव उसने एक अभियान का आयोजन किया
حَتّٰٓى اِذَا بَلَغَ مَغْرِبَ الشَّمْسِ وَجَدَهَا تَغْرُبُ ف۪ي عَيْنٍ حَمِئَةٍ وَوَجَدَ عِنْدَهَا قَوْمًاۜ قُلْنَا يَا ذَا الْقَرْنَيْنِ اِمَّٓا اَنْ تُعَذِّبَ وَاِمَّٓا اَنْ تَتَّخِذَ ف۪يهِمْ حُسْنًا86
यहाँ तक कि जब वह सूर्यास्त-स्थल तक पहुँचा तो उसे मटमैले काले पानी के एक स्रोत में डूबते हुए पाया और उसके निकट उसे एक क़ौम मिली। हमने कहा, "ऐ ज़ुलक़रनैन! तुझे अधिकार है कि चाहे तकलीफ़ पहुँचाए और चाहे उनके साथ अच्छा व्यवहार करे।"
قَالَ اَمَّا مَنْ ظَلَمَ فَسَوْفَ نُعَذِّبُهُ ثُمَّ يُرَدُّ اِلٰى رَبِّه۪ فَيُعَذِّبُهُ عَذَابًا نُكْرًا87
उसने कहा, "जो कोई ज़ुल्म करेगा उसे तो हम दंड देंगे। फिर वह अपने रब की ओर पलटेगा और वह उसे कठोर यातना देगा
وَاَمَّا مَنْ اٰمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا فَلَهُ جَزَٓاءًۨ الْحُسْنٰىۚ وَسَنَقُولُ لَهُ مِنْ اَمْرِنَا يُسْرًاۜ88
किन्तु जो कोई ईमान लाया औऱ अच्छा कर्म किया, उसके लिए तो अच्छा बदला है और हम उसे अपना सहज एवं मृदुल आदेश देंगे।"
ثُمَّ اَتْبَعَ سَبَبًا89
फिर उसने एक और अभियान का आयोजन किया
حَتّٰٓى اِذَا بَلَغَ مَطْلِعَ الشَّمْسِ وَجَدَهَا تَطْلُعُ عَلٰى قَوْمٍ لَمْ نَجْعَلْ لَهُمْ مِنْ دُونِهَا سِتْرًاۙ90
यहाँ तक कि जब वह सूर्योदय स्थल पर जा पहुँचा तो उसने उसे ऐसे लोगों पर उदित होते पाया जिनके लिए हमने सूर्य के मुक़ाबले में कोई ओट नहीं रखी थी
كَذٰلِكَۜ وَقَدْ اَحَطْنَا بِمَا لَدَيْهِ خُبْرًا91
ऐसा ही हमने किया था और जो कुछ उसके पास था, उसकी हमें पूरी ख़बर थी
ثُمَّ اَتْبَعَ سَبَبًا92
उसने फिर एक अभियान का आयोजन किया,
حَتّٰٓى اِذَا بَلَغَ بَيْنَ السَّدَّيْنِ وَجَدَ مِنْ دُونِهِمَا قَوْمًاۙ لَا يَكَادُونَ يَفْقَهُونَ قَوْلًا93
यहाँ तक कि जब वह दो पर्वतों के बीच पहुँचा तो उसे उनके इस किनारे कुछ पहुँचा तो उसे उनके इस किनारे कुछ लोग मिले, जो ऐसा लगाता नहीं था कि कोई बात समझ पाते हों
قَالُوا يَا ذَا الْقَرْنَيْنِ اِنَّ يَاْجُوجَ وَمَاْجُوجَ مُفْسِدُونَ فِي الْاَرْضِ فَهَلْ نَجْعَلُ لَكَ خَرْجًا عَلٰٓى اَنْ تَجْعَلَ بَيْنَنَا وَبَيْنَهُمْ سَدًّا94
उन्होंने कहा, "ऐ ज़ुलक़रनैन! याजूज और माजूज इस भूभाग में उत्पात मचाते हैं। क्या हम तुम्हें कोई कर इस बात काम के लिए दें कि तुम हमारे और उनके बीच एक अवरोध निर्मित कर दो?"
قَالَ مَا مَكَّنّ۪ي ف۪يهِ رَبّ۪ي خَيْرٌ فَاَع۪ينُون۪ي بِقُوَّةٍ اَجْعَلْ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ رَدْمًاۙ95
उसने कहा, "मेरे रब ने मुझे जो कुछ अधिकार एवं शक्ति दी है वह उत्तम है। तुम तो बस बल में मेरी सहायता करो। मैं तुम्हारे और उनके बीच एक सुदृढ़ दीवार बनाए देता हूँ
اٰتُون۪ي زُبَرَ الْحَد۪يدِۜ حَتّٰٓى اِذَا سَاوٰى بَيْنَ الصَّدَفَيْنِ قَالَ انْفُخُواۜ حَتّٰٓى اِذَا جَعَلَهُ نَارًاۙ قَالَ اٰتُون۪ٓي اُفْرِغْ عَلَيْهِ قِطْرًاۜ96
मुझे लोहे के टुकड़े ला दो।" यहाँ तक कि जब दोनों पर्वतों के बीच के रिक्त स्थान को पाटकर बराबर कर दिया तो कहा, "धौंको!" यहाँ तक कि जब उसे आग कर दिया तो कहा, "मुझे पिघला हुआ ताँबा ला दो, ताकि मैं उसपर उँड़ेल दूँ।"
فَمَا اسْطَاعُٓوا اَنْ يَظْهَرُوهُ وَمَا اسْتَطَاعُوا لَهُ نَقْبًا97
तो न तो वे (याजूज, माजूज) उसपर चढ़कर आ सकते थे और न वे उसमें सेंध ही लगा सकते थे