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343. पृष्ठ
23 · अल-मोमिनून
وَاَنْزَلْنَا مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً بِقَدَرٍ فَاَسْكَنَّاهُ فِي الْاَرْضِۗ وَاِنَّا عَلٰى ذَهَابٍ بِه۪ لَقَادِرُونَۚ18
और हमने आकाश से एक अंदाज़े के साथ पानी उतारा। फिर हमने उसे धरती में ठहरा दिया, और उसे विलुप्त करने की सामर्थ्य भी हमें प्राप्त है
فَاَنْشَاْنَا لَكُمْ بِه۪ جَنَّاتٍ مِنْ نَخ۪يلٍ وَاَعْنَابٍۢ لَكُمْ ف۪يهَا فَوَاكِهُ كَث۪يرَةٌ وَمِنْهَا تَاْكُلُونَۙ19
फिर हमने उसके द्वारा तुम्हारे लिए खजूरो और अंगूरों के बाग़ पैदा किए। तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फल है (जिनमें तुम्हारे लिए कितने ही लाभ है) और उनमें से तुम खाते हो
وَشَجَرَةً تَخْرُجُ مِنْ طُورِ سَيْنَٓاءَ تَنْبُتُ بِالدُّهْنِ وَصِبْغٍ لِلْاٰكِل۪ينَ20
और वह वृक्ष भी जो सैना पर्वत से निकलता है, जो तेल और खानेवालों के लिए सालन लिए हुए उगता है
وَاِنَّ لَكُمْ فِي الْاَنْعَامِ لَعِبْرَةًۜ نُسْق۪يكُمْ مِمَّا ف۪ي بُطُونِهَا وَلَكُمْ ف۪يهَا مَنَافِعُ كَث۪يرَةٌ وَمِنْهَا تَاْكُلُونَۙ21
और निश्चय ही तुम्हारे लिए चौपायों में भी एक शिक्षा है। उनके पेटों में जो कुछ है उसमें से हम तुम्हें पिलाते है। औऱ तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फ़ायदे है और उन्हें तुम खाते भी हो
وَعَلَيْهَا وَعَلَى الْفُلْكِ تُحْمَلُونَ۟22
और उनपर और नौकाओं पर तुम सवार होते हो
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَا نُوحًا اِلٰى قَوْمِه۪ فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللّٰهَ مَا لَكُمْ مِنْ اِلٰهٍ غَيْرُهُۜ اَفَلَا تَتَّقُونَ23
हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर भेजा तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा और कोई इष्ट-पूज्य नहीं है तो क्या तुम डर नहीं रखते?"
فَقَالَ الْمَلَؤُ۬ا الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ قَوْمِه۪ مَا هٰذَٓا اِلَّا بَشَرٌ مِثْلُكُمْۙ يُر۪يدُ اَنْ يَتَفَضَّلَ عَلَيْكُمْۜ وَلَوْ شَٓاءَ اللّٰهُ لَاَنْزَلَ مَلٰٓئِكَةًۚ مَا سَمِعْنَا بِهٰذَا ف۪ٓي اٰبَٓائِنَا الْاَوَّل۪ينَۚ24
इसपर उनकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, कहने लगे, "यह तो बस तुम्हीं जैसा एक मनुष्य है। चाहता है कि तुमपर श्रेष्ठता प्राप्त करे।""अल्लाह यदि चाहता तो फ़रिश्ते उतार देता। यह बात तो हमने अपने अगले बाप-दादा के समयों से सुनी ही नहीं
اِنْ هُوَ اِلَّا رَجُلٌ بِه۪ جِنَّةٌ فَتَرَبَّصُوا بِه۪ حَتّٰى ح۪ينٍ25
यह तो बस एक उन्मादग्रस्त व्यक्ति है। अतः एक समय तक इसकी प्रतीक्षा कर लो।"
قَالَ رَبِّ انْصُرْن۪ي بِمَا كَذَّبُونِ26
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! इन्होंने मुझे जो झुठलाया है, इसपर तू मेरी सहायता कर।"
فَاَوْحَيْنَٓا اِلَيْهِ اَنِ اصْنَعِ الْفُلْكَ بِاَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا فَاِذَا جَٓاءَ اَمْرُنَا وَفَارَ التَّنُّورُۙ فَاسْلُكْ ف۪يهَا مِنْ كُلٍّ زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ وَاَهْلَكَ اِلَّا مَنْ سَبَقَ عَلَيْهِ الْقَوْلُ مِنْهُمْۚ وَلَا تُخَاطِبْن۪ي فِي الَّذ۪ينَ ظَلَمُواۚ اِنَّهُمْ مُغْرَقُونَ27
तब हमने उसकी ओर प्रकाशना की कि "हमारी आँखों के सामने और हमारी प्रकाशना के अनुसार नौका बना और फिर जब हमारा आदेश आ जाए और तूफ़ान उमड़ पड़े तो प्रत्येक प्रजाति में से एक-एक जोड़ा उसमें रख ले और अपने लोगों को भी, सिवाय उनके जिनके विरुद्ध पहले फ़ैसला हो चुका है। और अत्याचारियों के विषय में मुझसे बात न करना। वे तो डूबकर रहेंगे