351. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

351. पृष्ठ
24 · अन-नूर
اِنَّ الَّذ۪ينَ جَٓاؤُ۫ بِالْاِفْكِ عُصْبَةٌ مِنْكُمْۜ لَا تَحْسَبُوهُ شَرًّا لَكُمْۜ بَلْ هُوَ خَيْرٌ لَكُمْۜ لِكُلِّ امْرِئٍ مِنْهُمْ مَا اكْتَسَبَ مِنَ الْاِثْمِۚ وَالَّذ۪ي تَوَلّٰى كِبْرَهُ مِنْهُمْ لَهُ عَذَابٌ عَظ۪يمٌ11
जो लोग तोहमत घड़ लाए है वे तुम्हारे ही भीतर की एक टोली है। तुम उसे अपने लिए बुरा मत समझो, बल्कि वह भी तुम्हारे लिए अच्छा ही है। उनमें से प्रत्येक व्यक्ति के लिए उतना ही हिस्सा है जितना गुनाह उसने कमाया, और उनमें से जिस व्यक्ति ने उसकी ज़िम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा अपने सिर लिया उसके लिए बड़ा यातना है
لَوْلَٓا اِذْ سَمِعْتُمُوهُ ظَنَّ الْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بِاَنْفُسِهِمْ خَيْرًاۙ وَقَالُوا هٰذَٓا اِفْكٌ مُب۪ينٌ12
ऐसा क्यों न हुआ कि जब तुम लोगों ने उसे सुना था, तब मोमिन पुरुष और मोमिन स्त्रियाँ अपने आपसे अच्छा गुमान करते और कहते कि "यह तो खुली तोहमत है?"
لَوْلَا جَٓاؤُ۫ عَلَيْهِ بِاَرْبَعَةِ شُهَدَٓاءَۚ فَاِذْ لَمْ يَاْتُوا بِالشُّهَدَٓاءِ فَاُو۬لٰٓئِكَ عِنْدَ اللّٰهِ هُمُ الْكَاذِبُونَ13
आख़िर वे इसपर चार गवाह क्यों न लाए? अब जबकि वे गवाह नहीं लाए, तो अल्लाह की स्पष्ट में वही झूठे है
وَلَوْلَا فَضْلُ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِ لَمَسَّكُمْ ف۪ي مَٓا اَفَضْتُمْ ف۪يهِ عَذَابٌ عَظ۪يمٌۚ14
यदि तुमपर दुनिया और आख़िरत में अल्लाह की उदार कृपा और उसकी दयालुता न होती तो जिस बात में तुम पड़ गए उसके कारण तुम्हें एक बड़ी यातना आ लेती
اِذْ تَلَقَّوْنَهُ بِاَلْسِنَتِكُمْ وَتَقُولُونَ بِاَفْوَاهِكُمْ مَا لَيْسَ لَكُمْ بِه۪ عِلْمٌ وَتَحْسَبُونَهُ هَيِّنًاۗ وَهُوَ عِنْدَ اللّٰهِ عَظ۪يمٌ15
सोचो, जब तुम एक-दूसरे से उस (झूठ) को अपनी ज़बानों पर लेते जा रहे थे और तुम अपने मुँह से वह कुछ कहे जो रहे थे, जिसके विषय में तुम्हें कोई ज्ञान न था और तुम उसे एक साधारण बात समझ रहे थे; हालाँकि अल्लाह के निकट वह एक भारी बात थी
وَلَوْلَٓا اِذْ سَمِعْتُمُوهُ قُلْتُمْ مَا يَكُونُ لَنَٓا اَنْ نَتَكَلَّمَ بِهٰذَاۗ سُبْحَانَكَ هٰذَا بُهْتَانٌ عَظ۪يمٌ16
और ऐसा क्यों न हुआ कि जब तुमने उसे सुना था तो कह देते, "हमारे लिए उचित नहीं कि हम ऐसी बात ज़बान पर लाएँ। महान और उच्च है तू (अल्लाह)! यह तो एक बड़ी तोहमत है?"
يَعِظُكُمُ اللّٰهُ اَنْ تَعُودُوا لِمِثْلِه۪ٓ اَبَدًا اِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِن۪ينَۚ17
अल्लाह तुम्हें नसीहत करता है कि फिर कभी ऐसा न करना, यदि तुम मोमिन हो
وَيُبَيِّنُ اللّٰهُ لَكُمُ الْاٰيَاتِۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ18
अल्लाह तो आयतों को तुम्हारे लिए खोल-खोलकर बयान करता है। अल्लाह तो सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
اِنَّ الَّذ۪ينَ يُحِبُّونَ اَنْ تَش۪يعَ الْفَاحِشَةُ فِي الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌۙ فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِۜ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ وَاَنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ19
जो लोग चाहते है कि उन लोगों में जो ईमान लाए है, अश्लीहलता फैले, उनके लिए दुनिया और आख़िरत (लोक-परलोक) में दुखद यातना है। और अल्लाह बड़ा करुणामय, अत्यन्त दयावान है
وَلَوْلَا فَضْلُ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ وَاَنَّ اللّٰهَ رَؤُ۫فٌ رَح۪يمٌ۟20
और यदि तुमपर अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी दयालुता न होती (तॊ अवश्य ही तुमपर यातना आ जाती) और यह कि अल्लाह बड़ा करुणामय, अत्यन्त दयावान है।