356. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

356. पृष्ठ
24 · अन-नूर
يُقَلِّبُ اللّٰهُ الَّيْلَ وَالنَّهَارَۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَعِبْرَةً لِاُو۬لِي الْاَبْصَارِ44
अल्लाह ही रात और दिन का उलट-फेर करता है। निश्चय ही आँखें रखनेवालों के लिए इसमें एक शिक्षा है
وَاللّٰهُ خَلَقَ كُلَّ دَٓابَّةٍ مِنْ مَٓاءٍۚ فَمِنْهُمْ مَنْ يَمْش۪ي عَلٰى بَطْنِه۪ۚ وَمِنْهُمْ مَنْ يَمْش۪ي عَلٰى رِجْلَيْنِۚ وَمِنْهُمْ مَنْ يَمْش۪ي عَلٰٓى اَرْبَعٍۜ يَخْلُقُ اللّٰهُ مَا يَشَٓاءُۜ اِنَّ اللّٰهَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ45
अल्लाह ने हर जीवधारी को पानी से पैदा किया, तो उनमें से कोई अपने पेट के बल चलता है और कोई उनमें दो टाँगों पर चलता है और कोई चार (टाँगों) पर चलता है। अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है। निस्संदेह अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
لَقَدْ اَنْزَلْنَٓا اٰيَاتٍ مُبَيِّنَاتٍۜ وَاللّٰهُ يَهْد۪ي مَنْ يَشَٓاءُ اِلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍ46
हमने सत्य को प्रकट कर देनेवाली आयतें उतार दी है। आगे अल्लाह जिसे चाहता है सीधे मार्ग की ओर लगा देता है
وَيَقُولُونَ اٰمَنَّا بِاللّٰهِ وَبِالرَّسُولِ وَاَطَعْنَا ثُمَّ يَتَوَلّٰى فَر۪يقٌ مِنْهُمْ مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَۜ وَمَٓا اُو۬لٰٓئِكَ بِالْمُؤْمِن۪ينَ47
वे मुनाफ़िक लोग कहते है कि "हम अल्लाह और रसूल पर ईमान लाए और हमने आज्ञापालन स्वीकार किया।" फिर इसके पश्चात उनमें से एक गिरोह मुँह मोड़ जाता है। ऐसे लोग मोमिन नहीं है
وَاِذَا دُعُٓوا اِلَى اللّٰهِ وَرَسُولِه۪ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ اِذَا فَر۪يقٌ مِنْهُمْ مُعْرِضُونَ48
जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की ओर बुलाया जाता है, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला करें तो क्या देखते है कि उनमें से एक गिरोह कतरा जाता है;
وَاِنْ يَكُنْ لَهُمُ الْحَقُّ يَاْتُٓوا اِلَيْهِ مُذْعِن۪ينَۜ49
किन्तु यदि हक़ उन्हें मिलनेवाला हो तो उसकी ओर बड़े आज्ञाकारी बनकर चले आएँ
اَف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ اَمِ ارْتَابُٓوا اَمْ يَخَافُونَ اَنْ يَح۪يفَ اللّٰهُ عَلَيْهِمْ وَرَسُولُهُۜ بَلْ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ۟50
क्या उनके दिलों में रोग है या वे सन्देह में पड़े हुए है या उनको यह डर है कि अल्लाह औऱ उसका रसूल उनके साथ अन्याय करेंगे? नहीं, बल्कि बात यह है कि वही लोग अत्याचारी हैं
اِنَّمَا كَانَ قَوْلَ الْمُؤْمِن۪ينَ اِذَا دُعُٓوا اِلَى اللّٰهِ وَرَسُولِه۪ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ اَنْ يَقُولُوا سَمِعْنَا وَاَطَعْنَاۜ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ51
मोमिनों की बात तो बस यह होती है कि जब अल्लाह और उसके रसूल की ओर बुलाए जाएँ, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला करे, तो वे कहें, "हमने सुना और आज्ञापालन किया।" और वही सफलता प्राप्त करनेवाले हैं
وَمَنْ يُطِعِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ وَيَخْشَ اللّٰهَ وَيَتَّقْهِ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْفَٓائِزُونَ52
और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञा का पालन करे और अल्लाह से डरे और उसकी सीमाओं का ख़याल रखे, तो ऐसे ही लोग सफल है
وَاَقْسَمُوا بِاللّٰهِ جَهْدَ اَيْمَانِهِمْ لَئِنْ اَمَرْتَهُمْ لَيَخْرُجُنَّۜ قُلْ لَا تُقْسِمُواۚ طَاعَةٌ مَعْرُوفَةٌۜ اِنَّ اللّٰهَ خَب۪يرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ53
वे अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाते है कि यदि तुम उन्हें हुक्म दो तो वे अवश्य निकल खड़े होंगे। कह दो, "क़समें न खाओ। सामान्य नियम के अनुसार आज्ञापालन ही वास्तकिव चीज़ है। तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसकी ख़बर रखता है।"