362. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

362. पृष्ठ
25 · अल-फुरकान
وَقَالَ الَّذ۪ينَ لَا يَرْجُونَ لِقَٓاءَنَا لَوْلَٓا اُنْزِلَ عَلَيْنَا الْمَلٰٓئِكَةُ اَوْ نَرٰى رَبَّنَاۜ لَقَدِ اسْتَكْبَرُوا ف۪ٓي اَنْفُسِهِمْ وَعَتَوْ عُتُوًّا كَب۪يرًا21
जिन्हें हमसे मिलने की आशंका नहीं, वे कहते है, "क्यों न फ़रिश्ते हमपर उतरे या फिर हम अपने रब को देखते?" उन्होंने अपने जी में बड़ा घमंज किया और बड़ी सरकशी पर उतर आए
يَوْمَ يَرَوْنَ الْمَلٰٓئِكَةَ لَا بُشْرٰى يَوْمَئِذٍ لِلْمُجْرِم۪ينَ وَيَقُولُونَ حِجْرًا مَحْجُورًا22
जिस दिन वे फ़रिश्तों को देखेंगे उस दिन अपराधियों के लिए कोई ख़ुशख़बरी न होगी और वे पुकार उठेंगे, "पनाह! पनाह!!"
وَقَدِمْنَٓا اِلٰى مَا عَمِلُوا مِنْ عَمَلٍ فَجَعَلْنَاهُ هَبَٓاءً مَنْثُورًا23
हम बढ़ेंगे उस कर्म की ओर जो उन्होंने किया होगा और उसे उड़ती धूल कर देंगे
اَصْحَابُ الْجَنَّةِ يَوْمَئِذٍ خَيْرٌ مُسْتَقَرًّا وَاَحْسَنُ مَق۪يلًا24
उस दिन जन्नतवाले ठिकाने की दृष्टि से अच्छे होगे और आरामगाह की दृष्टि से भी अच्छे होंगे
وَيَوْمَ تَشَقَّقُ السَّمَٓاءُ بِالْغَمَامِ وَنُزِّلَ الْمَلٰٓئِكَةُ تَنْز۪يلًا25
उस दिन आकाश एक बादल के साथ फटेगा और फ़रिश्ते भली प्रकार उतारे जाएँगे
اَلْمُلْكُ يَوْمَئِذٍۨ الْحَقُّ لِلرَّحْمٰنِۜ وَكَانَ يَوْمًا عَلَى الْكَافِر۪ينَ عَس۪يرًا26
उस दिन वास्तविक राज्य रहमान का होगा और वह दिन इनकार करनेवालों के लिए बड़ा ही मुश्किल होगा
وَيَوْمَ يَعَضُّ الظَّالِمُ عَلٰى يَدَيْهِ يَقُولُ يَا لَيْتَن۪ي اتَّخَذْتُ مَعَ الرَّسُولِ سَب۪يلًا27
उस दिन अत्याचारी अत्याचारी अपने हाथ चबाएगा। कहेंगा, "ऐ काश! मैंने रसूल के साथ मार्ग अपनाया होता!
يَا وَيْلَتٰى لَيْتَن۪ي لَمْ اَتَّخِذْ فُلَانًا خَل۪يلًا28
हाय मेरा दुर्भाग्य! काश, मैंने अमुक व्यक्ति को मित्र न बनाया होता!
لَقَدْ اَضَلَّن۪ي عَنِ الذِّكْرِ بَعْدَ اِذْ جَٓاءَن۪يۜ وَكَانَ الشَّيْطَانُ لِلْاِنْسَانِ خَذُولًا29
उसने मुझे भटकाकर अनुस्मृति से विमुख कर दिया, इसके पश्चात कि वह मेरे पास आ चुकी थी। शैतान तो समय पर मनुष्य का साथ छोड़ ही देता है।"
وَقَالَ الرَّسُولُ يَا رَبِّ اِنَّ قَوْمِي اتَّخَذُوا هٰذَا الْقُرْاٰنَ مَهْجُورًا30
रसूल कहेगा, "ऐ मेरे रब! निस्संदेह मेरी क़ौम के लोगों ने इस क़ुरआन को व्यर्थ बकवास की चीज़ ठहरा लिया था।"
وَكَذٰلِكَ جَعَلْنَا لِكُلِّ نَبِيٍّ عَدُوًّا مِنَ الْمُجْرِم۪ينَۜ وَكَفٰى بِرَبِّكَ هَادِيًا وَنَص۪يرًا31
और इसी तरह हमने अपराधियों में से प्रत्यॆक नबी के लिये शत्रु बनाया। मार्गदर्शन और सहायता कॆ लिए तॊ तुम्हारा रब ही काफ़ी है।
وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ الْقُرْاٰنُ جُمْلَةً وَاحِدَةًۚ كَذٰلِكَ لِنُثَبِّتَ بِه۪ فُؤَادَكَ وَرَتَّلْنَاهُ تَرْت۪يلًا32
और जिन लोगों ने इनकार किया उनका कहना है कि "उसपर पूरा क़ुरआन एक ही बार में क्यों नहीं उतारा?" ऐसा इसलिए किया गया ताकि हम इसके द्वारा तुम्हारे दिल को मज़बूत रखें और हमने इसे एक उचित क्रम में रखा