363. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
25 · अल-फुरकान
وَلَا يَاْتُونَكَ بِمَثَلٍ اِلَّا جِئْنَاكَ بِالْحَقِّ وَاَحْسَنَ تَفْس۪يرًاۜ33
और जब कभी भी वे तुम्हारे पास कोई आक्षेप की बात लेकर आएँगे तो हम तुम्हारे पास पक्की-सच्ची चीज़ लेकर आएँगे! इस दशा में कि वह स्पष्टीतकरण की स्पष्ट से उत्तम है
اَلَّذ۪ينَ يُحْشَرُونَ عَلٰى وُجُوهِهِمْ اِلٰى جَهَنَّمَۙ اُو۬لٰٓئِكَ شَرٌّ مَكَانًا وَاَضَلُّ سَب۪يلًا۟34
जो लोग औंधे मुँह जहन्नम की ओर ले जाए जाएँगे वही स्थान की दृष्टि से बहुत बुरे है, और मार्ग की दृष्टि से भी बहुत भटके हुए है
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ وَجَعَلْنَا مَعَهُٓ اَخَاهُ هٰرُونَ وَز۪يرًاۚ35
हमने मूसा को किताब प्रदान की और उसके भाई हारून को सहायक के रूप में उसके साथ किया
فَقُلْنَا اذْهَبَٓا اِلَى الْقَوْمِ الَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَاۜ فَدَمَّرْنَاهُمْ تَدْم۪يرًاۜ36
और कहा कि "तुम दोनों उन लोगों के पास जाओ जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया है।" अन्ततः हमने उन लोगों को विनष्ट करके रख दिया
وَقَوْمَ نُوحٍ لَمَّا كَذَّبُوا الرُّسُلَ اَغْرَقْنَاهُمْ وَجَعَلْنَاهُمْ لِلنَّاسِ اٰيَةًۜ وَاَعْتَدْنَا لِلظَّالِم۪ينَ عَذَابًا اَل۪يمًاۚ37
और नूह की क़ौम को भी, जब उन्होंने रसूलों को झुठलाया तो हमने उन्हें डुबा दिया और लोगों के लिए उन्हें एक निशानी बना दिया, और उन ज़ालिमों के लिए हमने एक दुखद यातना तैयार कर रखी है
وَعَادًا وَثَمُودَا۬ وَاَصْحَابَ الرَّسِّ وَقُرُونًا بَيْنَ ذٰلِكَ كَث۪يرًا38
और आद और समूद और अर-रस्सवालों और उस बीच की बहुत-सी नस्लों को भी विनष्ट किया।
وَكُلًّا ضَرَبْنَا لَهُ الْاَمْثَالَۘ وَكُلًّا تَبَّرْنَا تَتْب۪يرًا39
प्रत्येक के लिए हमने मिसालें बयान कीं। अन्ततः प्रत्येक को हमने पूरी तरह विध्वस्त कर दिया
وَلَقَدْ اَتَوْا عَلَى الْقَرْيَةِ الَّت۪ٓي اُمْطِرَتْ مَطَرَ السَّوْءِۜ اَفَلَمْ يَكُونُوا يَرَوْنَهَاۚ بَلْ كَانُوا لَا يَرْجُونَ نُشُورًا40
और उस बस्ती पर से तो वे हो आए है जिसपर बुरी वर्षा बरसी; तो क्या वे उसे देखते नहीं रहे हैं? नहीं, बल्कि वे दोबारा जीवित होकर उठने की आशा ही नहीं रखते रहे है
وَاِذَا رَاَوْكَ اِنْ يَتَّخِذُونَكَ اِلَّا هُزُوًاۜ اَهٰذَا الَّذ۪ي بَعَثَ اللّٰهُ رَسُولًا41
वे जब भी तुम्हें देखते हैं तो तुम्हारा मज़ाक़ बना लेते हैं कि "क्या यही, जिसे अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है?
اِنْ كَادَ لَيُضِلُّنَا عَنْ اٰلِهَتِنَا لَوْلَٓا اَنْ صَبَرْنَا عَلَيْهَاۜ وَسَوْفَ يَعْلَمُونَ ح۪ينَ يَرَوْنَ الْعَذَابَ مَنْ اَضَلُّ سَب۪يلًا42
इसने तो हमें भटकाकर हमको हमारे प्रभु-पूज्यों से फेर ही दिया होता, यदि हम उनपर मज़बूती से जम न गए होते।"
اَرَاَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ اِلٰهَهُ هَوٰيهُۜ اَفَاَنْتَ تَكُونُ عَلَيْهِ وَك۪يلًاۙ43
क्या तुमने उसको भी देखा, जिसने अपना प्रभु अपनी (तुच्छ) इच्छा को बना रखा है? तो क्या तुम उसका ज़िम्मा ले सकते हो