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365. पृष्ठ
25 · अल-फुरकान
وَمَٓا اَرْسَلْنَاكَ اِلَّا مُبَشِّرًا وَنَذ۪يرًا56
और हमने तो तुमको शुभ-सूचना देनेवाला और सचेतकर्ता बनाकर भेजा है।
قُلْ مَٓا اَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ اَجْرٍ اِلَّا مَنْ شَٓاءَ اَنْ يَتَّخِذَ اِلٰى رَبِّه۪ سَب۪يلًا57
कह दो, "मैं इस काम पर तुमसे कोई बदला नहीं माँगता सिवाय इसके कि जो कोई चाहे अपने रब की ओर ले जानेवाला मार्ग अपना ले।"
وَتَوَكَّلْ عَلَى الْحَيِّ الَّذ۪ي لَا يَمُوتُ وَسَبِّحْ بِحَمْدِه۪ۜ وَكَفٰى بِه۪ بِذُنُوبِ عِبَادِه۪ خَب۪يرًاۚۛ58
और उस अल्लाह पर भरोसा करो जो जीवन्त और अमर है और उसका गुणगान करो। वह अपने बन्दों के गुनाहों की ख़बर रखने के लिए काफ़ी है
اَلَّذ۪ي خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا ف۪ي سِتَّةِ اَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوٰى عَلَى الْعَرْشِۚۛ اَلرَّحْمٰنُ فَسْـَٔلْ بِه۪ خَب۪يرًا59
जिसने आकाशों और धरती को और जो कुछ उन दोनों के बीच है छह दिनों में पैदा किया, फिर सिंहासन पर विराजमान हुआ। रहमान है वह! अतः पूछो उससे जो उसकी ख़बर रखता है
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمُ اسْجُدُوا لِلرَّحْمٰنِ قَالُوا وَمَا الرَّحْمٰنُۗ اَنَسْجُدُ لِمَا تَاْمُرُنَا وَزَادَهُمْ نُفُورًا۟60
उन लोगों से जब कहा जाता है कि "रहमान को सजदा करो" तो वे कहते है, "और रहमान क्या होता है? क्या जिसे तू हमसे कह दे उसी को हम सजदा करने लगें?" और यह चीज़ उनकी घृणा को और बढ़ा देती है
تَبَارَكَ الَّذ۪ي جَعَلَ فِي السَّمَٓاءِ بُرُوجًا وَجَعَلَ ف۪يهَا سِرَاجًا وَقَمَرًا مُن۪يرًا61
बड़ी बरकतवाला है वह, जिसने आकाश में बुर्ज (नक्षत्र) बनाए और उसमें एक चिराग़ और एक चमकता चाँद बनाया
وَهُوَ الَّذ۪ي جَعَلَ الَّيْلَ وَالنَّهَارَ خِلْفَةً لِمَنْ اَرَادَ اَنْ يَذَّكَّرَ اَوْ اَرَادَ شُكُورًا62
और वही है जिसने रात और दिन को एक-दूसरे के पीछे आनेवाला बनाया, उस व्यक्ति के लिए (निशानी) जो चेतना चाहे या कृतज्ञ होना चाहे
وَعِبَادُ الرَّحْمٰنِ الَّذ۪ينَ يَمْشُونَ عَلَى الْاَرْضِ هَوْنًا وَاِذَا خَاطَبَهُمُ الْجَاهِلُونَ قَالُوا سَلَامًا63
रहमान के (प्रिय) बन्दें वहीं है जो धरती पर नम्रतापूर्वक चलते है और जब जाहिल उनके मुँह आएँ तो कह देते है, "तुमको सलाम!"
وَالَّذ۪ينَ يَب۪يتُونَ لِرَبِّهِمْ سُجَّدًا وَقِيَامًا64
जो अपने रब के आगे सजदे में और खड़े रातें गुज़ारते है;
وَالَّذ۪ينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا اصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَۗ اِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًاۗ65
जो कहते है कि "ऐ हमारे रब! जहन्नम की यातना को हमसे हटा दे।" निश्चय ही उनकी यातना चिमटकर रहनेवाली है
اِنَّهَا سَٓاءَتْ مُسْتَقَرًّا وَمُقَامًا66
निश्चय ही वह जगह ठहरने की दृष्टि! से भी बुरी है और स्थान की दृष्टि से भी
وَالَّذ۪ينَ اِذَٓا اَنْفَقُوا لَمْ يُسْرِفُوا وَلَمْ يَقْتُرُوا وَكَانَ بَيْنَ ذٰلِكَ قَوَامًا67
जो ख़र्च करते है तो न अपव्यय करते है और न ही तंगी से काम लेते है, बल्कि वे इनके बीच मध्यमार्ग पर रहते है