380. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
27 · अन-नमल
فَلَمَّا جَٓاءَ سُلَيْمٰنَ قَالَ اَتُمِدُّونَنِ بِمَالٍۘ فَمَٓا اٰتٰينِيَ اللّٰهُ خَيْرٌ مِمَّٓا اٰتٰيكُمْۚ بَلْ اَنْتُمْ بِهَدِيَّتِكُمْ تَفْرَحُونَ36
फिर जब वह सुलैमान के पास पहुँचा तो उसने (सुलैमान ने) कहा, "क्या तुम माल से मेरी सहायता करोगे, तो जो कुछ अल्लाह ने मुझे दिया है वह उससे कहीं उत्तम है, जो उसने तुम्हें दिया है? बल्कि तुम्ही लोग हो जो अपने उपहार से प्रसन्न होते हो!
اِرْجِعْ اِلَيْهِمْ فَلَنَاْتِيَنَّهُمْ بِجُنُودٍ لَا قِبَلَ لَهُمْ بِهَا وَلَنُخْرِجَنَّهُمْ مِنْهَٓا اَذِلَّةً وَهُمْ صَاغِرُونَ37
उनके पास वापस जाओ। हम उनपर ऐसी सेनाएँ लेकर आएँगे, जिनका मुक़ाबला वे न कर सकेंगे और हम उन्हें अपमानित करके वहाँ से निकाल देंगे कि वे पस्त होकर रहेंगे।"
قَالَ يَٓا اَيُّهَا الْمَلَؤُ۬ا اَيُّكُمْ يَاْت۪ين۪ي بِعَرْشِهَا قَبْلَ اَنْ يَاْتُون۪ي مُسْلِم۪ينَ38
उसने (सुलैमान ने) कहा, "ऐ सरदारो! तुममें कौन उसका सिंहासन लेकर मेरे पास आता है, इससे पहले कि वे लोग आज्ञाकारी होकर मेरे पास आएँ?"
قَالَ عِفْر۪يتٌ مِنَ الْجِنِّ اَنَا۬ اٰت۪يكَ بِه۪ قَبْلَ اَنْ تَقُومَ مِنْ مَقَامِكَۚ وَاِنّ۪ي عَلَيْهِ لَقَوِيٌّ اَم۪ينٌ39
जिन्नों में से एक बलिष्ठ निर्भीक ने कहा, "मैं उसे आपके पास ले आऊँगा। इससे पहले कि आप अपने स्थान से उठे। मुझे इसकी शक्ति प्राप्त है और मैं अमानतदार भी हूँ।"
قَالَ الَّذ۪ي عِنْدَهُ عِلْمٌ مِنَ الْكِتَابِ اَنَا۬ اٰت۪يكَ بِه۪ قَبْلَ اَنْ يَرْتَدَّ اِلَيْكَ طَرْفُكَۜ فَلَمَّا رَاٰهُ مُسْتَقِرًّا عِنْدَهُ قَالَ هٰذَا مِنْ فَضْلِ رَبّ۪ي۠ لِيَبْلُوَن۪ٓي ءَاَشْكُرُ اَمْ اَكْفُرُۜ وَمَنْ شَكَرَ فَاِنَّمَا يَشْكُرُ لِنَفْسِه۪ۚ وَمَنْ كَفَرَ فَاِنَّ رَبّ۪ي غَنِيٌّ كَر۪يمٌ40
जिस व्यक्ति के पास किताब का ज्ञान था, उसने कहा, "मैं आपकी पलक झपकने से पहले उसे आपके पास लाए देता हूँ।" फिर जब उसने उसे अपने पास रखा हुआ देखा तो कहा, "यह मेरे रब का उदार अनुग्रह है, ताकि वह मेरी परीक्षा करे कि मैं कृतज्ञता दिखाता हूँ या कृतघ्न बनता हूँ। जो कृतज्ञता दिखलाता है तो वह अपने लिए ही कृतज्ञता दिखलाता है और वह जिसने कृतघ्नता दिखाई, तो मेरा रब निश्चय ही निस्पृह, बड़ा उदार है।"
قَالَ نَكِّرُوا لَهَا عَرْشَهَا نَنْظُرْ اَتَهْتَد۪ٓي اَمْ تَكُونُ مِنَ الَّذ۪ينَ لَا يَهْتَدُونَ41
उसने कहा, "उसके पास उसके सिंहासन का रूप बदल दो। देंखे वह वास्तविकता को पा लेती है या उन लोगों में से होकर रह जाती है, जो वास्तविकता को पा लेती है या उन लोगों में से होकर जाती है, जो वास्तविकता को पा लेती है या उन लोगों में से होकर रह जाती है, जो वास्तविकता को नहीं पाते।"
فَلَمَّا جَٓاءَتْ ق۪يلَ اَهٰكَذَا عَرْشُكِۜ قَالَتْ كَاَنَّهُ هُوَۚ وَاُو۫ت۪ينَا الْعِلْمَ مِنْ قَبْلِهَا وَكُنَّا مُسْلِم۪ينَ42
जब वह आई तो कहा गया, "क्या तुम्हारा सिंहासन ऐसा ही है?" उसने कहा, "यह तो जैसे वही है, और हमें तो इससे पहले ही ज्ञान प्राप्त हो चुका था; और हम आज्ञाकारी हो गए थे।"
وَصَدَّهَا مَا كَانَتْ تَعْبُدُ مِنْ دُونِ اللّٰهِۜ اِنَّهَا كَانَتْ مِنْ قَوْمٍ كَافِر۪ينَ43
अल्लाह से हटकर वह दूसरे को पूजती थी। इसी चीज़ ने उसे रोक रखा था। निस्संदेह वह एक इनकार करनेवाली क़ौम में से थी
ق۪يلَ لَهَا ادْخُلِي الصَّرْحَۚ فَلَمَّا رَاَتْهُ حَسِبَتْهُ لُجَّةً وَكَشَفَتْ عَنْ سَاقَيْهَاۜ قَالَ اِنَّهُ صَرْحٌ مُمَرَّدٌ مِنْ قَوَار۪يرَۜ قَالَتْ رَبِّ اِنّ۪ي ظَلَمْتُ نَفْس۪ي وَاَسْلَمْتُ مَعَ سُلَيْمٰنَ لِلّٰهِ رَبِّ الْعَالَم۪ينَ۟44
उससे कहा गया कि "महल में प्रवेश करो।" तो जब उसने उसे देखा तो उसने उसको गहरा पानी समझा और उसने अपनी दोनों पिंडलियाँ खोल दी। उसने कहा, "यह तो शीशे से निर्मित महल है।" बोली, "ऐ मेरे रब! निश्चय ही मैंने अपने आपपर ज़ुल्म किया। अब मैंने सुलैमान के साथ अपने आपको अल्लाह के समर्पित कर दिया, जो सारे संसार का रब है।"