392. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

392. पृष्ठ
28 · अल-क़सस
وَلَقَدْ وَصَّلْنَا لَهُمُ الْقَوْلَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَۜ۟51
और हम उनके लिए वाणी बराबर अवतरित करते रहे, शायद वे ध्यान दें
اَلَّذ۪ينَ اٰتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ مِنْ قَبْلِه۪ هُمْ بِه۪ يُؤْمِنُونَ52
जिन लोगों को हमने इससे पूर्व किताब दी थी, वे इसपर ईमान लाते है
وَاِذَا يُتْلٰى عَلَيْهِمْ قَالُٓوا اٰمَنَّا بِه۪ٓ اِنَّهُ الْحَقُّ مِنْ رَبِّنَٓا اِنَّا كُنَّا مِنْ قَبْلِه۪ مُسْلِم۪ينَ53
और जब यह उनको पढ़कर सुनाया जाता है तो वे कहते है, "हम इसपर ईमान लाए। निश्चय ही यह सत्य है हमारे रब की ओर से। हम तो इससे पहले ही से मुस्लिम (आज्ञाकारी) हैं।"
اُو۬لٰٓئِكَ يُؤْتَوْنَ اَجْرَهُمْ مَرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا وَيَدْرَؤُ۫نَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنْفِقُونَ54
ये वे लोग है जिन्हें उनका प्रतिदान दुगना दिया जाएगा, क्योंकि वे जमे रहे और भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते है और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दी हैं, उसमें से ख़र्च करते है
وَاِذَا سَمِعُوا اللَّغْوَ اَعْرَضُوا عَنْهُ وَقَالُوا لَنَٓا اَعْمَالُنَا وَلَكُمْ اَعْمَالُكُمْۘ سَلَامٌ عَلَيْكُمْۘ لَا نَبْتَغِي الْجَاهِل۪ينَ55
और जब वे व्यर्थ की बात सुनते है तो यह कहते हुए उससे किनारा खींच लेते है कि "हमारे लिए हमारे कर्म है और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म है। तुमको सलाम है! ज़ाहिलों को हम नहीं चाहते।"
اِنَّكَ لَا تَهْد۪ي مَنْ اَحْبَبْتَ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ يَهْد۪ي مَنْ يَشَٓاءُۚ وَهُوَ اَعْلَمُ بِالْمُهْتَد۪ينَ56
तुम जिसे चाहो राह पर नहीं ला सकते, किन्तु अल्लाह जिसे चाहता है राह दिखाता है, और वही राह पानेवालों को भली-भाँति जानता है
وَقَالُٓوا اِنْ نَتَّبِعِ الْهُدٰى مَعَكَ نُتَخَطَّفْ مِنْ اَرْضِنَاۜ اَوَلَمْ نُمَكِّنْ لَهُمْ حَرَمًا اٰمِنًا يُجْبٰٓى اِلَيْهِ ثَمَرَاتُ كُلِّ شَيْءٍ رِزْقًا مِنْ لَدُنَّا وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ57
वे कहते है, "यदि हम तुम्हारे साथ इस मार्गदर्शन का अनुसरण करें तो अपने भू-भाग से उचक लिए जाएँगे।" क्या ख़तरों से सुरक्षित हरम में हमने ठिकाना नहीं दिया, जिसकी ओर हमारी ओर से रोज़ी के रूप में हर चीज़ की पैदावार खिंची चली आती है? किन्तु उनमें से अधिकतर जानते नहीं
وَكَمْ اَهْلَكْنَا مِنْ قَرْيَةٍ بَطِرَتْ مَع۪يشَتَهَاۚ فَتِلْكَ مَسَاكِنُهُمْ لَمْ تُسْكَنْ مِنْ بَعْدِهِمْ اِلَّا قَل۪يلًاۜ وَكُنَّا نَحْنُ الْوَارِث۪ينَ58
हमने कितनी ही बस्तियों को विनष्ट कर डाला, जिन्होंने अपनी गुज़र-बसर के संसाधन पर इतराते हुए अकृतज्ञता दिखाई। तो वे है उनके घर, जो उनके बाद आबाद थोड़े ही हुए। अन्ततः हम ही वारिस हुए
وَمَا كَانَ رَبُّكَ مُهْلِكَ الْقُرٰى حَتّٰى يَبْعَثَ ف۪ٓي اُمِّهَا رَسُولًا يَتْلُوا عَلَيْهِمْ اٰيَاتِنَاۚ وَمَا كُنَّا مُهْلِكِي الْقُرٰٓى اِلَّا وَاَهْلُهَا ظَالِمُونَ59
तेरा रब तो बस्तियों को विनष्ट करनेवाला नहीं जब तक कि उनकी केन्द्रीय बस्ती में कोई रसूल न भेज दे, जो हमारी आयतें सुनाए। और हम बस्तियों को विनष्ट करनेवाले नहीं सिवाय इस स्थिति के कि वहाँ के रहनेवाले ज़ालिम हों