394. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

394. पृष्ठ
28 · अल-क़सस
قُلْ اَرَاَيْتُمْ اِنْ جَعَلَ اللّٰهُ عَلَيْكُمُ الَّيْلَ سَرْمَدًا اِلٰى يَوْمِ الْقِيٰمَةِ مَنْ اِلٰهٌ غَيْرُ اللّٰهِ يَاْت۪يكُمْ بِضِيَٓاءٍۜ اَفَلَا تَسْمَعُونَ71
‍‍कहो, "क्या तुमने विचार किया कि यदि अल्लाह क़ियामत के दिन तक सदैव के लिए तुमपर रात कर दे तो अल्लाह के सिवा कौन इष्ट-प्रभु है जो तुम्हारे लिए प्रकाश लाए? तो क्या तुम देखते नहीं?"
قُلْ اَرَاَيْتُمْ اِنْ جَعَلَ اللّٰهُ عَلَيْكُمُ النَّهَارَ سَرْمَدًا اِلٰى يَوْمِ الْقِيٰمَةِ مَنْ اِلٰهٌ غَيْرُ اللّٰهِ يَاْت۪يكُمْ بِلَيْلٍ تَسْكُنُونَ ف۪يهِۜ اَفَلَا تُبْصِرُونَ72
कहो, "क्या तुमने विचार किया? यदि अल्लाह क़ियामत के दिन तक सदैव के लिए तुमपर दिन कर दे तो अल्लाह के सिवा दूसरा कौन इष्ट-पूज्य है जो तुम्हारे लिए रात लाए जिसमें तुम आराम पाते हो? तो क्या तुम देखते नहीं?
وَمِنْ رَحْمَتِه۪ جَعَلَ لَكُمُ الَّيْلَ وَالنَّهَارَ لِتَسْكُنُوا ف۪يهِ وَلِتَبْتَغُوا مِنْ فَضْلِه۪ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ73
उसने अपनी दयालुता से तुम्हारे लिए रात और दिन बनाए, ताकि तुम उसमें (रात में) आराम पाओ और ताकि तुम (दिन में) उसका अनुग्रह (रोज़ी) तलाश करो और ताकि तुम कृतज्ञता दिखाओ।"
وَيَوْمَ يُنَاد۪يهِمْ فَيَقُولُ اَيْنَ شُرَكَٓاءِيَ الَّذ۪ينَ كُنْتُمْ تَزْعُمُونَ74
ख़याल करो, जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा और कहेगा, "कहाँ है मेरे वे मेरे साझीदार, जिनका तुम्हे दावा था?"
وَنَزَعْنَا مِنْ كُلِّ اُمَّةٍ شَه۪يدًا فَقُلْنَا هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ فَعَلِمُٓوا اَنَّ الْحَقَّ لِلّٰهِ وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ۟75
और हम प्रत्येक समुदाय में से एक गवाह निकाल लाएँगे और कहेंगे, "लाओ अपना प्रमाण।" तब वे जान लेंगे कि सत्य अल्लाह की ओर से है और जो कुछ वे घड़ते थे, वह सब उनसे गुम होकर रह जाएगा
اِنَّ قَارُونَ كَانَ مِنْ قَوْمِ مُوسٰى فَبَغٰى عَلَيْهِمْۖ وَاٰتَيْنَاهُ مِنَ الْكُنُوزِ مَٓا اِنَّ مَفَاتِحَهُ لَتَنُٓواُ بِالْعُصْبَةِ اُ۬ولِي الْقُوَّةِۗ اِذْ قَالَ لَهُ قَوْمُهُ لَا تَفْرَحْ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ الْفَرِح۪ينَ76
निश्चय ही क़ारून मूसा की क़ौम में से था, फिर उसने उनके विरुद्ध सिर उठाया और हमने उसे इतने ख़जाने दे रखें थे कि उनकी कुंजियाँ एक बलशाली दल को भारी पड़ती थी। जब उससे उसकी क़ौम के लोगों ने कहा, "इतरा मत, अल्लाह इतरानेवालों के पसन्द नही करता
وَابْتَغِ ف۪يمَٓا اٰتٰيكَ اللّٰهُ الدَّارَ الْاٰخِرَةَ وَلَا تَنْسَ نَص۪يبَكَ مِنَ الدُّنْيَا وَاَحْسِنْ كَمَٓا اَحْسَنَ اللّٰهُ اِلَيْكَ وَلَا تَبْغِ الْفَسَادَ فِي الْاَرْضِۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ الْمُفْسِد۪ينَ77
जो कुछ अल्लाह ने तुझे दिया है, उसमें आख़िरत के घर का निर्माण कर और दुनिया में से अपना हिस्सा न भूल, और भलाई कर, जैसा कि अल्लाह ने तेरे साथ भलाई की है, और धरती का बिगाड़ मत चाह। निश्चय ही अल्लाह बिगाड़ पैदा करनेवालों को पसन्द नहीं करता।"