404. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
29 · अल-अंकबूत30 · अर-रूम
وَمَا هٰذِهِ الْحَيٰوةُ الدُّنْيَٓا اِلَّا لَهْوٌ وَلَعِبٌۜ وَاِنَّ الدَّارَ الْاٰخِرَةَ لَهِيَ الْحَيَوَانُۢ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ64
और यह सांसारिक जीवन तो केवल दिल का बहलावा और खेल है। निस्संदेह पश्चात्वर्ती घर (का जीवन) ही वास्तविक जीवन है। क्या ही अच्छा होता कि वे जानते!
فَاِذَا رَكِبُوا فِي الْفُلْكِ دَعَوُا اللّٰهَ مُخْلِص۪ينَ لَهُ الدّ۪ينَۚ فَلَمَّا نَجّٰيهُمْ اِلَى الْبَرِّ اِذَا هُمْ يُشْرِكُونَۙ65
जब वे नौका में सवार होते है तो वे अल्लाह को उसके दीन (आज्ञापालन) के लिए निष्ठा वान होकर पुकारते है। किन्तु जब वह उन्हें बचाकर शु्ष्क भूमि तक ले आता है तो क्या देखते है कि वे लगे (अल्लाह का साथ) साझी ठहराने
لِيَكْفُرُوا بِمَٓا اٰتَيْنَاهُمْۙ وَلِيَتَمَتَّعُوا۠ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ66
ताकि जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसके प्रति वे इस तरह कृतघ्नता दिखाएँ, और ताकि इस तरह से मज़े उड़ा ले। अच्छा तो वे शीघ्र ही जान लेंगे
اَوَلَمْ يَرَوْا اَنَّا جَعَلْنَا حَرَمًا اٰمِنًا وَيُتَخَطَّفُ النَّاسُ مِنْ حَوْلِهِمْۜ اَفَبِالْبَاطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَةِ اللّٰهِ يَكْفُرُونَ67
क्या उन्होंने देखा नही कि हमने एक शान्तिमय हरम बनाया, हालाँकि उनके आसपास से लोग उचक लिए जाते है, तो क्या फिर भी वे असत्य पर ईमान रखते है और अल्लाह की अनुकम्पा के प्रति कृतघ्नता दिखलाते है?
وَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًا اَوْ كَذَّبَ بِالْحَقِّ لَمَّا جَٓاءَهُۜ اَلَيْسَ ف۪ي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِلْكَافِر۪ينَ68
उस व्यक्ति से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़े या सत्य को झुठलाए, जबकि वह उसके पास आ चुका हो? क्या इनकार करनेवालों का ठौर-ठिकाना जहन्नम नें नहीं होगा?
وَالَّذ۪ينَ جَاهَدُوا ف۪ينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَاۜ وَاِنَّ اللّٰهَ لَمَعَ الْمُحْسِن۪ينَ69
रहे वे लोग जिन्होंने हमारे मार्ग में मिलकर प्रयास किया, हम उन्हें अवश्य अपने मार्ग दिखाएँगे। निस्संदेह अल्लाह सुकर्मियों के साथ है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
الٓمٓ۠1
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰
غُلِبَتِ الرُّومُۙ2
रूमी निकटवर्ती क्षेत्र में पराभूत हो गए हैं।
ف۪ٓي اَدْنَى الْاَرْضِ وَهُمْ مِنْ بَعْدِ غَلَبِهِمْ سَيَغْلِبُونَۙ3
और वे अपने पराभव के पश्चात शीघ्र ही कुछ वर्षों में प्रभावी हो जाएँगे।
ف۪ي بِضْعِ سِن۪ينَۜ لِلّٰهِ الْاَمْرُ مِنْ قَبْلُ وَمِنْ بَعْدُۜ وَيَوْمَئِذٍ يَفْرَحُ الْمُؤْمِنُونَۙ4
हुक्म तो अल्लाह ही का है पहले भी और उसके बाद भी। और उस दिन ईमानवाले अल्लाह की सहायता से प्रसन्न होंगे।
بِنَصْرِ اللّٰهِۜ يَنْصُرُ مَنْ يَشَٓاءُۜ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الرَّح۪يمُ5
वह जिसकी चाहता है, सहायता करता है। वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, दयावान है