407. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
30 · अर-रूम
وَمِنْ اٰيَاتِه۪ٓ اَنْ تَقُومَ السَّمَٓاءُ وَالْاَرْضُ بِاَمْرِه۪ۜ ثُمَّ اِذَا دَعَاكُمْ دَعْوَةً مِنَ الْاَرْضِ اِذَٓا اَنْتُمْ تَخْرُجُونَ25
और उसकी निशानियों में से यह भी है कि आकाश और धरती उसके आदेश से क़ायम है। फिर जब वह तुम्हे एक बार पुकारकर धरती में से बुलाएगा, तो क्या देखेंगे कि सहसा तुम निकल पड़े
وَلَهُ مَنْ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ كُلٌّ لَهُ قَانِتُونَ26
आकाशों और धरती में जो कोई भी उसी का है। प्रत्येक उसी के निष्ठावान आज्ञाकारी है
وَهُوَ الَّذ۪ي يَبْدَؤُا الْخَلْقَ ثُمَّ يُع۪يدُهُ وَهُوَ اَهْوَنُ عَلَيْهِۜ وَلَهُ الْمَثَلُ الْاَعْلٰى فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۚ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ۟27
वही है जो सृष्टि का आरम्भ करता है। फिर वही उसकी पुनरावृत्ति करेगा। और यह उसके लिए अधिक सरल है। आकाशों और धरती में उसी मिसाल (गुण) सर्वोच्च है। और वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी हैं
ضَرَبَ لَكُمْ مَثَلًا مِنْ اَنْفُسِكُمْۜ هَلْ لَكُمْ مِنْ مَا مَلَكَتْ اَيْمَانُكُمْ مِنْ شُرَكَٓاءَ ف۪ي مَا رَزَقْنَاكُمْ فَاَنْتُمْ ف۪يهِ سَوَٓاءٌ تَخَافُونَهُمْ كَخ۪يفَتِكُمْ اَنْفُسَكُمْۜ كَذٰلِكَ نُفَصِّلُ الْاٰيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ28
उसने तुम्हारे लिए स्वयं तुम्हीं में से एक मिसाल पेश की है। क्या जो रोज़ी हमने तुम्हें दी है, उसमें तुम्हारे अधीनस्थों में से, कुछ तुम्हारे साझीदार है कि तुम सब उसमें बराबर के हो, तुम उनका ऐसा डर रखते हो जैसा अपने लोगों का डर रखते हो? - इसप्रकार हम उन लोगों के लिए आयतें खोल-खोलकर प्रस्तुत करते है जो बुद्धि से काम लेते है। -
بَلِ اتَّبَعَ الَّذ۪ينَ ظَلَمُٓوا اَهْوَٓاءَهُمْ بِغَيْرِ عِلْمٍۚ فَمَنْ يَهْد۪ي مَنْ اَضَلَّ اللّٰهُۜ وَمَا لَهُمْ مِنْ نَاصِر۪ينَ29
नहीं, बल्कि ये ज़ालिम तो बिना ज्ञान के अपनी इच्छाओं के पीछे चल पड़े। तो अब कौन उसे मार्ग दिखाएगा जिसे अल्लाह ने भटका दिया हो? ऐसे लोगो का तो कोई सहायक नहीं
فَاَقِمْ وَجْهَكَ لِلدّ۪ينِ حَن۪يفًاۜ فِطْرَةَ اللّٰهِ الَّت۪ي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَاۜ لَا تَبْد۪يلَ لِخَلْقِ اللّٰهِۜ ذٰلِكَ الدّ۪ينُ الْقَيِّمُۗ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَۗ30
अतः एक ओर का होकर अपने रुख़ को 'दीन' (धर्म) की ओर जमा दो, अल्लाह की उस प्रकृति का अनुसरण करो जिसपर उसने लोगों को पैदा किया। अल्लाह की बनाई हुई संरचना बदली नहीं जा सकती। यही सीधा और ठीक धर्म है, किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं।
مُن۪يب۪ينَ اِلَيْهِ وَاتَّقُوهُ وَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَلَا تَكُونُوا مِنَ الْمُشْرِك۪ينَۙ31
उसकी ओर रुजू करनेवाले (प्रवृत्त होनेवाले) रहो। और उसका डर रखो और नमाज़ का आयोजन करो और (अल्लाह का) साझी ठहरानेवालों में से न होना,
مِنَ الَّذ۪ينَ فَرَّقُوا د۪ينَهُمْ وَكَانُوا شِيَعًاۜ كُلُّ حِزْبٍ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ32
उन लोगों में से जिन्होंने अपनी दीन (धर्म) को टुकड़े-टुकड़े कर डाला और गिरोहों में बँट गए। हर गिरोह के पास जो कुछ है, उसी में मग्न है