412. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
31 · लुक़मान
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا لُقْمٰنَ الْحِكْمَةَ اَنِ اشْكُرْ لِلّٰهِۜ وَمَنْ يَشْكُرْ فَاِنَّمَا يَشْكُرُ لِنَفْسِه۪ۚ وَمَنْ كَفَرَ فَاِنَّ اللّٰهَ غَنِيٌّ حَم۪يدٌ12
निश्चय ही हमने लुकमान को तत्वदर्शिता प्रदान की थी कि अल्लाह के प्रति कृतज्ञता दिखलाओ और जो कोई कृतज्ञता दिखलाए, वह अपने ही भले के लिए कृतज्ञता दिखलाता है। और जिसने अकृतज्ञता दिखलाई तो अल्लाह वास्तव में निस्पृह, प्रशंसनीय है
وَاِذْ قَالَ لُقْمٰنُ لِابْنِه۪ وَهُوَ يَعِظُهُ يَا بُنَيَّ لَا تُشْرِكْ بِاللّٰهِۜ اِنَّ الشِّرْكَ لَظُلْمٌ عَظ۪يمٌ13
याद करो जब लुकमान ने अपने बेटे से, उसे नसीहत करते हुए कहा, "ऐ मेरे बेटे! अल्लाह का साझी न ठहराना। निश्चय ही शिर्क (बहुदेववाद) बहुत बड़ा ज़ुल्म है।"
وَوَصَّيْنَا الْاِنْسَانَ بِوَالِدَيْهِۚ حَمَلَتْهُ اُمُّهُ وَهْنًا عَلٰى وَهْنٍ وَفِصَالُهُ ف۪ي عَامَيْنِ اَنِ اشْكُرْ ل۪ي وَلِوَالِدَيْكَۜ اِلَيَّ الْمَص۪يرُ14
और हमने मनुष्य को उसके अपने माँ-बाप के मामले में ताकीद की है - उसकी माँ ने निढाल होकर उसे पेट में रखा और दो वर्ष उसके दूध छूटने में लगे - कि "मेरे प्रति कृतज्ञ हो और अपने माँ-बाप के प्रति भी। अंततः मेरी ही ओर आना है
وَاِنْ جَاهَدَاكَ عَلٰٓى اَنْ تُشْرِكَ ب۪ي مَا لَيْسَ لَكَ بِه۪ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَا وَصَاحِبْهُمَا فِي الدُّنْيَا مَعْرُوفًاۘ وَاتَّبِعْ سَب۪يلَ مَنْ اَنَابَ اِلَيَّۚ ثُمَّ اِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَاُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ15
किन्तु यदि वे तुझपर दबाव डाले कि तू किसी को मेरे साथ साझी ठहराए, जिसका तुझे ज्ञान नहीं, तो उसकी बात न मानना और दुनिया में उसके साथ भले तरीके से रहना। किन्तु अनुसरण उस व्यक्ति के मार्ग का करना जो मेरी ओर रुजू हो। फिर तुम सबको मेरी ही ओर पलटना है; फिर मैं तुम्हें बता दूँगा जो कुछ तुम करते रहे होगे।"-
يَا بُنَيَّ اِنَّهَٓا اِنْ تَكُ مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِنْ خَرْدَلٍ فَتَكُنْ ف۪ي صَخْرَةٍ اَوْ فِي السَّمٰوَاتِ اَوْ فِي الْاَرْضِ يَاْتِ بِهَا اللّٰهُۜ اِنَّ اللّٰهَ لَط۪يفٌ خَب۪يرٌ16
"ऐ मेरे बेटे! इसमें सन्देह नहीं कि यदि वह राई के दाने के बराबर भी हो, फिर वह किसी चट्टान के बीच हो या आकाशों में हो या धरती में हो, अल्लाह उसे ला उपस्थित करेगा। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त सूक्ष्मदर्शी, ख़बर रखनेवाला है।
يَا بُنَيَّ اَقِمِ الصَّلٰوةَ وَاْمُرْ بِالْمَعْرُوفِ وَانْهَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَاصْبِرْ عَلٰى مَٓا اَصَابَكَۜ اِنَّ ذٰلِكَ مِنْ عَزْمِ الْاُمُورِۚ17
"ऐ मेरे बेटे! नमाज़ का आयोजन कर और भलाई का हुक्म दे और बुराई से रोक और जो मुसीबत भी तुझपर पड़े उसपर धैर्य से काम ले। निस्संदेह ये उन कामों में से है जो अनिवार्य और ढृढसंकल्प के काम है
وَلَا تُصَعِّرْ خَدَّكَ لِلنَّاسِ وَلَا تَمْشِ فِي الْاَرْضِ مَرَحًاۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُورٍۚ18
"और लोगों से अपना रूख़ न फेर और न धरती में इतराकर चल। निश्चय ही अल्लाह किसी अहंकारी, डींग मारनेवाले को पसन्द नहीं करता
وَاقْصِدْ ف۪ي مَشْيِكَ وَاغْضُضْ مِنْ صَوْتِكَۜ اِنَّ اَنْكَرَ الْاَصْوَاتِ لَصَوْتُ الْحَم۪يرِ۟19
"और अपनी चाल में सहजता और संतुलन बनाए रख और अपनी आवाज़ धीमी रख। निस्संदेह आवाज़ों में सबसे बुरी आवाज़ गधों की आवाज़ होती है।"