413. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
31 · लुक़मान
اَلَمْ تَرَوْا اَنَّ اللّٰهَ سَخَّرَ لَكُمْ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِ وَاَسْبَغَ عَلَيْكُمْ نِعَمَهُ ظَاهِرَةً وَبَاطِنَةًۜ وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يُجَادِلُ فِي اللّٰهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَلَا هُدًى وَلَا كِتَابٍ مُن۪يرٍ20
क्या तुमने देखा नहीं कि अल्लाह ने, जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है, सबको तुम्हारे काम में लगा रखा है और उसने तुमपर अपनी प्रकट और अप्रकट अनुकम्पाएँ पूर्ण कर दी है? इसपर भी कुछ लोग ऐसे है जो अल्लाह के विषय में बिना किसी ज्ञान, बिना किसी मार्गदर्शन और बिना किसी प्रकाशमान किताब के झगड़ते है
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمُ اتَّبِعُوا مَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ قَالُوا بَلْ نَتَّبِعُ مَا وَجَدْنَا عَلَيْهِ اٰبَٓاءَنَاۜ اَوَلَوْ كَانَ الشَّيْطَانُ يَدْعُوهُمْ اِلٰى عَذَابِ السَّع۪يرِ21
अब जब उनसे कहा जाता है कि "उस चीज़ का अनुसरण करो जो अल्लाह न उतारी है," तो कहते है, "नहीं, बल्कि हम तो उस चीज़ का अनुसरण करेंगे जिसपर हमने अपने बाप-दादा को पाया है।" क्या यद्यपि शैतान उनको भड़कती आग की यातना की ओर बुला रहा हो तो भी?
وَمَنْ يُسْلِمْ وَجْهَهُٓ اِلَى اللّٰهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَقَدِ اسْتَمْسَكَ بِالْعُرْوَةِ الْوُثْقٰىۜ وَاِلَى اللّٰهِ عَاقِبَةُ الْاُمُورِ22
जो कोई आज्ञाकारिता के साथ अपना रुख़ अल्लाह की ओर करे, और वह उत्तमकर भी हो तो उसने मज़बूत सहारा थाम लिया। सारे मामलों की परिणति अल्लाह ही की ओर है
وَمَنْ كَفَرَ فَلَا يَحْزُنْكَ كُفْرُهُۜ اِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ فَنُنَبِّئُهُمْ بِمَا عَمِلُواۜ اِنَّ اللّٰهَ عَل۪يمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ23
और जिस किसी ने इनकार किया तो उसका इनकार तुम्हें शोकाकुल न करे। हमारी ही ओर तो उन्हें पलटकर आना है। फिर जो कुछ वे करते रहे होंगे, उससे हम उन्हें अवगत करा देंगे। निस्संदेह अल्लाह सीनों की बात तक जानता है
نُمَتِّعُهُمْ قَل۪يلًا ثُمَّ نَضْطَرُّهُمْ اِلٰى عَذَابٍ غَل۪يظٍ24
हम उन्हें थोड़ा मज़ा उड़ाने देंगे। फिर उन्हें विवश करके एक कठोर यातना की ओर खींच ले जाएँगे
وَلَئِنْ سَاَلْتَهُمْ مَنْ خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ لَيَقُولُنَّ اللّٰهُۜ قُلِ الْحَمْدُ لِلّٰهِۜ بَلْ اَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ25
यदि तुम उनसे पूछो कि "आकाशों और धरती को किसने पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे कि "अल्लाह ने।" कहो, "प्रशंसा भी अल्लाह के लिए है।" वरन उनमें से अधिकांश जानते नहीं
لِلّٰهِ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ اِنَّ اللّٰهَ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَم۪يدُ26
आकाशों और धरती में जो कुछ है अल्लाह ही का है। निस्संदेह अल्लाह ही निस्पृह, स्वतः प्रशंसित है
وَلَوْ اَنَّ مَا فِي الْاَرْضِ مِنْ شَجَرَةٍ اَقْلَامٌ وَالْبَحْرُ يَمُدُّهُ مِنْ بَعْدِه۪ سَبْعَةُ اَبْحُرٍ مَا نَفِدَتْ كَلِمَاتُ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ27
धरती में जितने वृक्ष है, यदि वे क़लम हो जाएँ और समुद्र उसकी स्याही हो जाए, उसके बाद सात और समुद्र हों, तब भी अल्लाह के बोल समाप्त न हो सकेंगे। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
مَا خَلْقُكُمْ وَلَا بَعْثُكُمْ اِلَّا كَنَفْسٍ وَاحِدَةٍۜ اِنَّ اللّٰهَ سَم۪يعٌ بَص۪يرٌ28
तुम सबका पैदा करना और तुम सबका जीवित करके पुनः उठाना तो बस ऐसा है, जैसे एक जीव का। अल्लाह तो सब कुछ सुनता, देखता है