423. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
33 · अल-अहज़ाब
وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ اِذَا قَضَى اللّٰهُ وَرَسُولُهُٓ اَمْرًا اَنْ يَكُونَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ مِنْ اَمْرِهِمْۜ وَمَنْ يَعْصِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا مُب۪ينًا36
न किसी ईमानवाले पुरुष और न किसी ईमानवाली स्त्री को यह अधिकार है कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी मामले का फ़ैसला कर दें, तो फिर उन्हें अपने मामले में कोई अधिकार शेष रहे। जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करे तो वह खुली गुमराही में पड़ गया
وَاِذْ تَقُولُ لِلَّذ۪ٓي اَنْعَمَ اللّٰهُ عَلَيْهِ وَاَنْعَمْتَ عَلَيْهِ اَمْسِكْ عَلَيْكَ زَوْجَكَ وَاتَّقِ اللّٰهَ وَتُخْف۪ي ف۪ي نَفْسِكَ مَا اللّٰهُ مُبْد۪يهِ وَتَخْشَى النَّاسَۚ وَاللّٰهُ اَحَقُّ اَنْ تَخْشٰيهُۜ فَلَمَّا قَضٰى زَيْدٌ مِنْهَا وَطَرًا زَوَّجْنَاكَهَا لِكَيْ لَا يَكُونَ عَلَى الْمُؤْمِن۪ينَ حَرَجٌ ف۪ٓي اَزْوَاجِ اَدْعِيَٓائِهِمْ اِذَا قَضَوْا مِنْهُنَّ وَطَرًاۜ وَكَانَ اَمْرُ اللّٰهِ مَفْعُولًا37
याद करो (ऐ नबी), जबकि तुम उस व्यक्ति से कह रहे थे जिसपर अल्लाह ने अनुकम्पा की, और तुमने भी जिसपर अनुकम्पा की कि "अपनी पत्नी को अपने पास रोक रखो और अल्लाह का डर रखो, और तुम अपने जी में उस बात को छिपा रहे हो जिसको अल्लाह प्रकट करनेवाला है। तुम लोगों से डरते हो, जबकि अल्लाह इसका ज़्यादा हक़ रखता है कि तुम उससे डरो।" अतः जब ज़ैद उससे अपनी ज़रूरत पूरी कर चुका तो हमने उसका तुमसे विवाह कर दिया, ताकि ईमानवालों पर अपने मुँह बोले बेटों की पत्नियों के मामले में कोई तंगी न रहे जबकि वे उनसे अपनी ज़रूरत पूरी कर लें। अल्लाह का फ़ैसला तो पूरा होकर ही रहता है
مَا كَانَ عَلَى النَّبِيِّ مِنْ حَرَجٍ ف۪يمَا فَرَضَ اللّٰهُ لَهُۜ سُنَّةَ اللّٰهِ فِي الَّذ۪ينَ خَلَوْا مِنْ قَبْلُۜ وَكَانَ اَمْرُ اللّٰهِ قَدَرًا مَقْدُورًاۙ38
नबी पर उस काम में कोई तंगी नहीं जो अल्लाह ने उसके लिए ठहराया हो। यही अल्लाह का दस्तूर उन लोगों के मामले में भी रहा है जो पहले गुज़र चुके है - और अल्लाह का काम तो जँचा-तुला होता है। -
اَلَّذ۪ينَ يُبَلِّغُونَ رِسَالَاتِ اللّٰهِ وَيَخْشَوْنَهُ وَلَا يَخْشَوْنَ اَحَدًا اِلَّا اللّٰهَۜ وَكَفٰى بِاللّٰهِ حَس۪يبًا39
जो अल्लाह के सन्देश पहुँचाते थे और उसी से डरते थे और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते थे। और हिसाब लेने के लिए अल्लाह काफ़ी है। -
مَا كَانَ مُحَمَّدٌ اَبَٓا اَحَدٍ مِنْ رِجَالِكُمْ وَلٰكِنْ رَسُولَ اللّٰهِ وَخَاتَمَ النَّبِيّ۪نَۜ وَكَانَ اللّٰهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمًا۟40
मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के बाप नहीं है, बल्कि वे अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक है। अल्लाह को हर चीज़ का पूरा ज्ञान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اذْكُرُوا اللّٰهَ ذِكْرًا كَث۪يرًاۙ41
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह को अधिक याद करो
وَسَبِّحُوهُ بُكْرَةً وَاَص۪يلًا42
और प्रातःकाल और सन्ध्या समय उसकी तसबीह करते रहो -
هُوَ الَّذ۪ي يُصَلّ۪ي عَلَيْكُمْ وَمَلٰٓئِكَتُهُ لِيُخْرِجَكُمْ مِنَ الظُّلُمَاتِ اِلَى النُّورِۜ وَكَانَ بِالْمُؤْمِن۪ينَ رَح۪يمًا43
वही है जो तुमपर रहमत भेजता है और उसके फ़रिश्ते भी (दुआएँ करते है) - ताकि वह तुम्हें अँधरों से प्रकाश की ओर निकाल लाए। वास्तव में, वह ईमानवालों पर बहुत दयालु है