433. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
34 · सबा
وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَم۪يعًا ثُمَّ يَقُولُ لِلْمَلٰٓئِكَةِ اَهٰٓؤُ۬لَٓاءِ اِيَّاكُمْ كَانُوا يَعْبُدُونَ40
याद करो जिस दिन वह उन सबको इकट्ठा करेगा, फिर फ़रिश्तों से कहेगा, "क्या तुम्ही को ये पूजते रहे है?"
قَالُوا سُبْحَانَكَ اَنْتَ وَلِيُّنَا مِنْ دُونِهِمْۚ بَلْ كَانُوا يَعْبُدُونَ الْجِنَّۚ اَكْثَرُهُمْ بِهِمْ مُؤْمِنُونَ41
वे कहेंगे, "महान है तू, हमारा निकटता का मधुर सम्बन्ध तो तुझी से है, उनसे नहीं; बल्कि बात यह है कि वे जिन्नों को पूजते थे। उनमें से अधिकतर उन्हीं पर ईमान रखते थे।"
فَالْيَوْمَ لَا يَمْلِكُ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ نَفْعًا وَلَا ضَرًّاۜ وَنَقُولُ لِلَّذ۪ينَ ظَلَمُوا ذُوقُوا عَذَابَ النَّارِ الَّت۪ي كُنْتُمْ بِهَا تُكَذِّبُونَ42
"अतः आज न तो तुम परस्पर एक-दूसरे के लाभ का अधिकार रखते हो और न हानि का।" और हम उन ज़ालिमों से कहेंगे, "अब उस आग की यातना का मज़ा चखो, जिसे तुम झुठलाते रहे हो।"
وَاِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِمْ اٰيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ قَالُوا مَا هٰذَٓا اِلَّا رَجُلٌ يُر۪يدُ اَنْ يَصُدَّكُمْ عَمَّا كَانَ يَعْبُدُ اٰبَٓاؤُ۬كُمْۚ وَقَالُوا مَا هٰذَٓا اِلَّٓا اِفْكٌ مُفْتَرًىۜ وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لِلْحَقِّ لَمَّا جَٓاءَهُمْۙ اِنْ هٰذَٓا اِلَّا سِحْرٌ مُب۪ينٌ43
उन्हें जब हमारी स्पष्ट़ आयतें पढ़कर सुनाई जाती है तो वे कहते है, "यह तो बस ऐसा व्यक्ति है जो चाहता है कि तुम्हें उनसे रोक दें जिनको तुम्हारे बाप-दादा पूजते रहे है।" और कहते है, "यह तो एक घड़ा हुआ झूठ है।" जिन लोगों ने इनकार किया उन्होंने सत्य के विषय में, जबकि वह उनके पास आया, कह दिया, "यह तो बस एक प्रत्यक्ष जादू है।"
وَمَٓا اٰتَيْنَاهُمْ مِنْ كُتُبٍ يَدْرُسُونَهَا وَمَٓا اَرْسَلْنَٓا اِلَيْهِمْ قَبْلَكَ مِنْ نَذ۪يرٍۜ44
हमने उन्हें न तो किताबे दी थीं, जिनको वे पढ़ते हों और न तुमसे पहले उनकी ओर कोई सावधान करनेवाला ही भेजा था
وَكَذَّبَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۙ وَمَا بَلَغُوا مِعْشَارَ مَٓا اٰتَيْنَاهُمْ فَكَذَّبُوا رُسُل۪ي۠ فَكَيْفَ كَانَ نَك۪يرِ۟45
और झूठलाया उन लोगों ने भी जो उनसे पहले थे। और जो कुछ हमने उन्हें दिया था ये तो उसके दसवें भाग को भी नहीं पहुँचे है। तो उन्होंने मेरे रसूलों को झुठलाया। तो फिर कैसी रही मेरी यातना!
قُلْ اِنَّمَٓا اَعِظُكُمْ بِوَاحِدَةٍۚ اَنْ تَقُومُوا لِلّٰهِ مَثْنٰى وَفُرَادٰى ثُمَّ تَتَفَكَّرُوا۠ مَا بِصَاحِبِكُمْ مِنْ جِنَّةٍۜ اِنْ هُوَ اِلَّا نَذ۪يرٌ لَكُمْ بَيْنَ يَدَيْ عَذَابٍ شَد۪يدٍ46
कहो, "मैं तुम्हें बस एक बात की नसीहत करता हूँ कि अल्लाह के लिए दो-दो औऱ एक-एक करके उठ रखे हो; फिर विचार करो। तुम्हारे साथी को कोई उन्माद नहीं है। वह तो एक कठोर यातना से पहले तुम्हें सचेत करनेवाला ही है।"
قُلْ مَا سَاَلْتُكُمْ مِنْ اَجْرٍ فَهُوَ لَكُمْۜ اِنْ اَجْرِيَ اِلَّا عَلَى اللّٰهِۚ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ شَه۪يدٌ47
कहो, "मैं तुमसे कोई बदला नहीं माँगता वह तुम्हें ही मुबारक हो। मेरा बदला तो बस अल्लाह के ज़िम्मे है और वह हर चीज का साक्षी है।"
قُلْ اِنَّ رَبّ۪ي يَقْذِفُ بِالْحَقِّۚ عَلَّامُ الْغُيُوبِ48
कहो, "निश्चय ही मेरा रब सत्य को असत्य पर ग़ालिब करता है। वह परोक्ष की बातें भली-भाँथि जानता है।"