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437. पृष्ठ
35 · फ़ातिर
وَمَا يَسْتَوِي الْاَعْمٰى وَالْبَص۪يرُۙ19
अंधा और आँखोंवाला बराबर नहीं,
وَلَا الظُّلُمَاتُ وَلَا النُّورُۙ20
और न अँधेरे और प्रकाश,
وَلَا الظِّلُّ وَلَا الْحَرُورُۚ21
और न छाया और धूप
وَمَا يَسْتَوِي الْاَحْيَٓاءُ وَلَا الْاَمْوَاتُۜ اِنَّ اللّٰهَ يُسْمِعُ مَنْ يَشَٓاءُۚ وَمَٓا اَنْتَ بِمُسْمِعٍ مَنْ فِي الْقُبُورِ22
और न जीवित और मृत बराबर है। निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है सुनाता है। तुम उन लोगों को नहीं सुना सकते, जो क़ब्रों में हो।
اِنْ اَنْتَ اِلَّا نَذ۪يرٌ23
तुम तो बस एक सचेतकर्ता हो
اِنَّٓا اَرْسَلْنَاكَ بِالْحَقِّ بَش۪يرًا وَنَذ۪يرًاۜ وَاِنْ مِنْ اُمَّةٍ اِلَّا خَلَا ف۪يهَا نَذ۪يرٌ24
हमने तुम्हें सत्य के साथ भेजा है, शुभ-सूचना देनेवाला और सचेतकर्ता बनाकर। और जो भी समुदाय गुज़रा है, उसमें अनिवार्यतः एक सचेतकर्ता हुआ है
وَاِنْ يُكَذِّبُوكَ فَقَدْ كَذَّبَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۚ جَٓاءَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ وَبِالزُّبُرِ وَبِالْكِتَابِ الْمُن۪يرِ25
यदि वे तुम्हें झुठलाते है तो जो उनसे पहले थे वे भी झुठला चुके है। उनके रसूल उनके पास स्पष्ट और ज़बूरें और प्रकाशमान किताब लेकर आए थे
ثُمَّ اَخَذْتُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا فَكَيْفَ كَانَ نَك۪يرِ۟26
फिर मैं उन लोगों को, जिन्होंने इनकार किया, पकड़ लिया (तो फिर कैसा रहा मेरा इनकार!)
اَلَمْ تَرَ اَنَّ اللّٰهَ اَنْزَلَ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءًۚ فَاَخْرَجْنَا بِه۪ ثَمَرَاتٍ مُخْتَلِفًا اَلْوَانُهَاۜ وَمِنَ الْجِبَالِ جُدَدٌ ب۪يضٌ وَحُمْرٌ مُخْتَلِفٌ اَلْوَانُهَا وَغَرَاب۪يبُ سُودٌ27
क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह ने आकाश से पानी बरसाया, फिर उसके द्वारा हमने फल निकाले, जिनके रंग विभिन्न प्रकार के होते है? और पहाड़ो में भी श्वेत और लाल विभिन्न रंगों की धारियाँ पाई जाती है, और भुजंग काली भी
وَمِنَ النَّاسِ وَالدَّوَٓابِّ وَالْاَنْعَامِ مُخْتَلِفٌ اَلْوَانُهُ كَذٰلِكَۜ اِنَّمَا يَخْشَى اللّٰهَ مِنْ عِبَادِهِ الْعُلَمٰٓؤُ۬اۜ اِنَّ اللّٰهَ عَز۪يزٌ غَفُورٌ28
और मनुष्यों और जानवरों और चौपायों के रंग भी इसी प्रकार भिन्न हैं। अल्लाह से डरते तो उसके वही बन्दे हैं, जो बाख़बर है। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, क्षमाशील है
اِنَّ الَّذ۪ينَ يَتْلُونَ كِتَابَ اللّٰهِ وَاَقَامُوا الصَّلٰوةَ وَاَنْفَقُوا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً يَرْجُونَ تِجَارَةً لَنْ تَبُورَۙ29
निश्चय ही जो लोग अल्लाह की किताब पढ़ते हैं, इस हाल मे कि नमाज़ के पाबन्द हैं, और जो कुछ हमने उन्हें दिया है, उसमें से छिपे और खुले ख़र्च किया है, वे एक ऐसे व्यापार की आशा रखते है जो कभी तबाह न होगा
لِيُوَفِّيَهُمْ اُجُورَهُمْ وَيَز۪يدَهُمْ مِنْ فَضْلِه۪ۜ اِنَّهُ غَفُورٌ شَكُورٌ30
परिणामस्वरूप वह उन्हें उनके प्रतिदान पूरे-पूरे दे और अपने उदार अनुग्रह से उन्हें और अधिक भी प्रदान करे। निस्संदेह वह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त गुणग्राहक है