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444. पृष्ठ
36 · यासीन
اِنَّ اَصْحَابَ الْجَنَّةِ الْيَوْمَ ف۪ي شُغُلٍ فَاكِهُونَۚ55
निश्चय ही जन्नतवाले आज किसी न किसी काम नें व्यस्त आनन्द ले रहे है
هُمْ وَاَزْوَاجُهُمْ ف۪ي ظِلَالٍ عَلَى الْاَرَٓائِكِ مُتَّكِؤُ۫نَ56
वे और उनकी पत्नियों छायों में मसहरियों पर तकिया लगाए हुए है,
لَهُمْ ف۪يهَا فَاكِهَةٌ وَلَهُمْ مَا يَدَّعُونَۚ57
उनके लिए वहाँ मेवे है। औऱ उनके लिए वह सब कुछ मौजूद है, जिसकी वे माँग करें
سَلَامٌ قَوْلًا مِنْ رَبٍّ رَح۪يمٍ58
(उनपर) सलाम है, दयामय रब का उच्चारित किया हुआ
وَامْتَازُوا الْيَوْمَ اَيُّهَا الْمُجْرِمُونَ59
"और ऐ अपराधियों! आज तुम छँटकर अलग हो जाओ
اَلَمْ اَعْهَدْ اِلَيْكُمْ يَا بَن۪ٓي اٰدَمَ اَنْ لَا تَعْبُدُوا الشَّيْطَانَۚ اِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُب۪ينٌۙ60
क्या मैंने तुम्हें ताकीद नहीं की थी, ऐ आदम के बेटो! कि शैतान की बन्दगी न करे। वास्तव में वह तुम्हारा खुला शत्रु है
وَاَنِ اعْبُدُون۪يۜ هٰذَا صِرَاطٌ مُسْتَق۪يمٌ61
और यह कि मेरी बन्दगी करो? यही सीधा मार्ग है
وَلَقَدْ اَضَلَّ مِنْكُمْ جِبِلًّا كَث۪يرًاۜ اَفَلَمْ تَكُونُوا تَعْقِلُونَ62
उसने तो तुममें से बहुत-से गिरोहों को पथभ्रष्ट कर दिया। तो क्या तुम बुद्धि नहीं रखते थे?
هٰذِه۪ جَهَنَّمُ الَّت۪ي كُنْتُمْ تُوعَدُونَ63
यह वही जहन्नम है जिसकी तुम्हें धमकी दी जाती रही है
اِصْلَوْهَا الْيَوْمَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُونَ64
जो इनकार तुम करते रहे हो, उसके बदले में आज इसमें प्रविष्ट हो जाओ।"
اَلْيَوْمَ نَخْتِمُ عَلٰٓى اَفْوَاهِهِمْ وَتُكَلِّمُنَٓا اَيْد۪يهِمْ وَتَشْهَدُ اَرْجُلُهُمْ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ65
आज हम उनके मुँह पर मुहर लगा देंगे और उनके हाथ हमसे बोलेंगे और जो कुछ वे कमाते रहे है, उनके पाँव उसकी गवाही देंगे
وَلَوْ نَشَٓاءُ لَطَمَسْنَا عَلٰٓى اَعْيُنِهِمْ فَاسْتَبَقُوا الصِّرَاطَ فَاَنّٰى يُبْصِرُونَ66
यदि हम चाहें तो उनकी आँखें मेट दें क्योंकि वे (अपने रूढ़) मार्ग की और लपके हुए है। फिर उन्हें सुझाई कहाँ से देगा?
وَلَوْ نَشَٓاءُ لَمَسَخْنَاهُمْ عَلٰى مَكَانَتِهِمْ فَمَا اسْتَطَاعُوا مُضِيًّا وَلَا يَرْجِعُونَ۟67
यदि हम चाहें तो उनकी जगह पर ही उनके रूप बिगाड़कर रख दें क्योंकि वे सत्य की ओर न चल सके और वे (गुमराही से) बाज़ नहीं आते।
وَمَنْ نُعَمِّرْهُ نُنَكِّسْهُ فِي الْخَلْقِۜ اَفَلَا يَعْقِلُونَ68
जिसको हम दीर्धायु देते है, उसको उसकी संरचना में उल्टा फेर देते है। तो क्या वे बुद्धि से काम नहीं लेते?
وَمَا عَلَّمْنَاهُ الشِّعْرَ وَمَا يَنْبَغ۪ي لَهُۜ اِنْ هُوَ اِلَّا ذِكْرٌ وَقُرْاٰنٌ مُب۪ينٌۙ69
हमने उस (नबी) को कविता नहीं सिखाई और न वह उसके लिए शोभनीय है। वह तो केवल अनुस्मृति और स्पष्ट क़ुरआन है;
لِيُنْذِرَ مَنْ كَانَ حَيًّا وَيَحِقَّ الْقَوْلُ عَلَى الْكَافِر۪ينَ70
ताकि वह उसे सचेत कर दे जो जीवन्त हो और इनकार करनेवालों पर (यातना की) बात स्थापित हो जाए