455. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
38 · साद
وَمَا خَلَقْنَا السَّمَٓاءَ وَالْاَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا بَاطِلًاۜ ذٰلِكَ ظَنُّ الَّذ۪ينَ كَفَرُواۚ فَوَيْلٌ لِلَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنَ النَّارِۜ27
हमने आकाश और धरती को और जो कुछ उनके बीच है, व्यर्थ नहीं पैदा किया। यह तो उन लोगों का गुमान है जिन्होंने इनकार किया। अतः आग में झोंके जाने के कारण इनकार करनेवालों की बड़ी दुर्गति है
اَمْ نَجْعَلُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ كَالْمُفْسِد۪ينَ فِي الْاَرْضِۘ اَمْ نَجْعَلُ الْمُتَّق۪ينَ كَالْفُجَّارِ28
(क्या हम उनको जो समझते है कि जगत की संरचना व्यर्थ नहीं है, उनके समान कर देंगे जो जगत को निरर्थक मानते है।) या हम उन लोगों को जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उनके समान कर देंगे जो धरती में बिगाड़ पैदा करते है; या डर रखनेवालों को हम दुराचारियों जैसा कर देंगे?
كِتَابٌ اَنْزَلْنَاهُ اِلَيْكَ مُبَارَكٌ لِيَدَّبَّرُٓوا اٰيَاتِه۪ وَلِيَتَذَكَّرَ اُو۬لُوا الْاَلْبَابِ29
यह एक इसकी आयतों पर सोच-विचार करें और ताकि बुद्धि और समझवाले इससे शिक्षा ग्रहण करें।-
وَوَهَبْنَا لِدَاوُ۫دَ سُلَيْمٰنَۜ نِعْمَ الْعَبْدُۜ اِنَّهُٓ اَوَّابٌۜ30
और हमने दाऊद को सुलैमान प्रदान किया। वह कितना अच्छा बन्दा था! निश्चय ही वह बहुत ही रुजू रहनेवाला था।
اِذْ عُرِضَ عَلَيْهِ بِالْعَشِيِّ الصَّافِنَاتُ الْجِيَادُۙ31
याद करो, जबकि सन्ध्या समय उसके सामने सधे हुए द्रुतगामी घोड़े हाज़िर किए गए
فَقَالَ اِنّ۪ٓي اَحْبَبْتُ حُبَّ الْخَيْرِ عَنْ ذِكْرِ رَبّ۪يۚ حَتّٰى تَوَارَتْ بِالْحِجَابِ۠32
तो उसने कहा, "मैंने इनके प्रति प्रेम अपने रब की याद के कारण अपनाया है।" यहाँ तक कि वे (घोड़े) ओट में छिप गए
رُدُّوهَا عَلَيَّۜ فَطَفِقَ مَسْحًا بِالسُّوقِ وَالْاَعْنَاقِ33
"उन्हें मेरे पास वापस लाओ!" फिर वह उनकी पिंडलियों और गरदनों पर हाथ फेरने लगा
وَلَقَدْ فَتَنَّا سُلَيْمٰنَ وَاَلْقَيْنَا عَلٰى كُرْسِيِّه۪ جَسَدًا ثُمَّ اَنَابَ34
निश्चय ही हमने सुलैमान को भी परीक्षा में डाला। और हमने उसके तख़्त पर एक धड़ डाल दिया। फिर वह रुजू हुआ
قَالَ رَبِّ اغْفِرْ ل۪ي وَهَبْ ل۪ي مُلْكًا لَا يَنْبَغ۪ي لِاَحَدٍ مِنْ بَعْد۪يۚ اِنَّكَ اَنْتَ الْوَهَّابُ35
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और मुझे वह राज्य प्रदान कर, जो मेरे पश्चात किसी के लिए शोभनीय न हो। निश्चय ही तू बड़ा दाता है।"
فَسَخَّرْنَا لَهُ الرّ۪يحَ تَجْر۪ي بِاَمْرِه۪ رُخَٓاءً حَيْثُ اَصَابَۙ36
तब हमने वायु को उसके लिए वशीभूत कर दिया, जो उसके आदेश से, जहाँ वह पहुँचना चाहता, सरलतापूर्वक चलती थी
وَالشَّيَاط۪ينَ كُلَّ بَنَّٓاءٍ وَغَوَّاصٍۙ37
और शैतानों को भी (वशीभुत कर दिया), प्रत्येक निर्माता और ग़ोताख़ोर को
وَاٰخَر۪ينَ مُقَرَّن۪ينَ فِي الْاَصْفَادِ38
और दूसरों को भी जो ज़जीरों में जकड़े हुए रहत
هٰذَا عَطَٓاؤُ۬نَا فَامْنُنْ اَوْ اَمْسِكْ بِغَيْرِ حِسَابٍ39
"यह हमारी बेहिसाब देन है। अब एहसान करो या रोको।"
وَاِنَّ لَهُ عِنْدَنَا لَزُلْفٰى وَحُسْنَ مَاٰبٍ۟40
और निश्चय ही हमारे यहाँ उसके लिए अनिवार्यतः समीप्य और उत्तम ठिकाना है
وَاذْكُرْ عَبْدَنَٓا اَيُّوبَۢ اِذْ نَادٰى رَبَّهُٓ اَنّ۪ي مَسَّنِيَ الشَّيْطَانُ بِنُصْبٍ وَعَذَابٍۜ41
हमारे बन्दे अय्यूब को भी याद करो, जब उसने अपने रब को पुकारा कि "शैतान ने मुझे दुख और पीड़ा पहुँचा रखी है।"
اُرْكُضْ بِرِجْلِكَۚ هٰذَا مُغْتَسَلٌ بَارِدٌ وَشَرَابٌ42
"अपना पाँव (धरती पर) मार, यह है ठंडा (पानी) नहाने को और पीने को।"