464. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
39 · अज़-ज़ुमर
وَبَدَا لَهُمْ سَيِّـَٔاتُ مَا كَسَبُوا وَحَاقَ بِهِمْ مَا كَانُوا بِه۪ يَسْتَهْزِؤُ۫نَ48
और जो कुछ उन्होंने कमाया उसकी बुराइयाँ उनपर प्रकट हो जाएँगी। और वही चीज़ उन्हें घेर लेगी जिसकी वे हँसी उड़ाया करते थे
فَاِذَا مَسَّ الْاِنْسَانَ ضُرٌّ دَعَانَاۘ ثُمَّ اِذَا خَوَّلْنَاهُ نِعْمَةً مِنَّاۙ قَالَ اِنَّمَٓا اُو۫ت۪يتُهُ عَلٰى عِلْمٍۜ بَلْ هِيَ فِتْنَةٌ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ49
अतः जब मनुष्य को कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो वह हमें पुकारने लगता है, फिर जब हमारी ओर से उसपर कोई अनुकम्पा होती है तो कहता है, "यह तो मुझे ज्ञान के कारण प्राप्त हुआ।" नहीं, बल्कि यह तो एक परीक्षा है, किन्तु उनमें से अधिकतर जानते नहीं
قَدْ قَالَهَا الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَمَٓا اَغْنٰى عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَكْسِبُونَ50
यही बात वे लोग भी कह चुके है, जो उनसे पहले गुज़रे है। किन्तु जो कुछ कमाई वे करते है, वह उनके कुछ काम न आई
فَاَصَابَهُمْ سَيِّـَٔاتُ مَا كَسَبُواۜ وَالَّذ۪ينَ ظَلَمُوا مِنْ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ سَيُص۪يبُهُمْ سَيِّـَٔاتُ مَا كَسَبُواۙ وَمَا هُمْ بِمُعْجِز۪ينَ51
फिर जो कुछ उन्होंने कमाया, उसकी बुराइयाँ उनपर आ पड़ी और इनमें से भी जिन लोगों ने ज़ुल्म किया, उनपर भी जो कुछ उन्होंने कमाया उसकी बुराइयाँ जल्द ही आ पड़ेगी। और वे काबू से बाहर निकलनेवाले नहीं
اَوَلَمْ يَعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَٓاءُ وَيَقْدِرُۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ۟52
क्या उन्हें मालूम नहीं कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है नपी-तुली कर देता है? निस्संदेह इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ है जो ईमान लाएँ
قُلْ يَا عِبَادِيَ الَّذ۪ينَ اَسْرَفُوا عَلٰٓى اَنْفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَم۪يعًاۜ اِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّح۪يمُ53
कह दो, "ऐ मेरे बन्दो, जिन्होंने अपने आप पर ज्यादती की है, अल्लाह की दयालुता से निराश न हो। निस्संदेह अल्लाह सारे ही गुनाहों का क्षमा कर देता है। निश्चय ही वह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
وَاَن۪يبُٓوا اِلٰى رَبِّكُمْ وَاَسْلِمُوا لَهُ مِنْ قَبْلِ اَنْ يَاْتِيَكُمُ الْعَذَابُ ثُمَّ لَا تُنْصَرُونَ54
रुजू हो अपने रब की ओर और उसके आज्ञाकारी बन जाओ, इससे पहले कि तुमपर यातना आ जाए। फिर तुम्हारी सहायता न की जाएगी
وَاتَّبِعُٓوا اَحْسَنَ مَٓا اُنْزِلَ اِلَيْكُمْ مِنْ رَبِّكُمْ مِنْ قَبْلِ اَنْ يَاْتِيَكُمُ الْعَذَابُ بَغْتَةً وَاَنْتُمْ لَا تَشْعُرُونَۙ55
और अनुसर्ण करो उस सर्वोत्तम चीज़ का जो तुम्हारे रब की ओर से अवतरित हुई है, इससे पहले कि तुम पर अचानक यातना आ जाए और तुम्हें पता भी न हो।"
اَنْ تَقُولَ نَفْسٌ يَا حَسْرَتٰى عَلٰى مَا فَرَّطْتُ ف۪ي جَنْبِ اللّٰهِ وَاِنْ كُنْتُ لَمِنَ السَّاخِر۪ينَۙ56
कहीं ऐसा न हो कि कोई व्यक्ति कहने लगे, "हाय, अफ़सोस उसपर! जो कोताही अल्लाह के हक़ में मैंने की। और मैं तो परिहास करनेवालों मं ही सम्मिलित रहा।"