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468. पृष्ठ
40 · ग़ाफिर
رَبَّنَا وَاَدْخِلْهُمْ جَنَّاتِ عَدْنٍۨ الَّت۪ي وَعَدْتَهُمْ وَمَنْ صَلَحَ مِنْ اٰبَٓائِهِمْ وَاَزْوَاجِهِمْ وَذُرِّيَّاتِهِمْۜ اِنَّكَ اَنْتَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُۚ8
ऐ हमारे रब! और उन्हें सदैव रहने के बागों में दाख़िल कर जिनका तूने उनसे वादा किया है और उनके बाप-दादा और उनकी पत्नि यों और उनकी सन्ततियों में से जो योग्य हुए उन्हें भी। निस्संदेह तू प्रभुत्वशाली, अत्यन्त तत्वदर्शी है
وَقِهِمُ السَّيِّـَٔاتِۜ وَمَنْ تَقِ السَّيِّـَٔاتِ يَوْمَئِذٍ فَقَدْ رَحِمْتَهُۜ وَذٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظ۪يمُ۟9
और उन्हें अनिष्टों से बचा। जिसे उस दिन तूने अनिष्टों से बचा लिया, तो निश्चय ही उसपर तूने दया की। और वही बड़ी सफलता है।"
اِنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا يُنَادَوْنَ لَمَقْتُ اللّٰهِ اَكْبَرُ مِنْ مَقْتِكُمْ اَنْفُسَكُمْ اِذْ تُدْعَوْنَ اِلَى الْا۪يمَانِ فَتَكْفُرُونَ10
निश्चय ही जिन लोगों ने इनकार किया उन्हें पुकारकर कहा जाएगा कि "अपने आपसे जो तुम्हें विद्वेष एवं क्रोध है, तुम्हारे प्रति अल्लाह का क्रोध एवं द्वेष उससे कहीं बढकर है कि जब तुम्हें ईमान की ओर बुलाया जाता था तो तुम इनकार करते थे।"
قَالُوا رَبَّنَٓا اَمَتَّنَا اثْنَتَيْنِ وَاَحْيَيْتَنَا اثْنَتَيْنِ فَاعْتَرَفْنَا بِذُنُوبِنَا فَهَلْ اِلٰى خُرُوجٍ مِنْ سَب۪يلٍ11
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! तूने हमें दो बार मृत रखा और दो बार जीवन प्रदान किया। अब हमने अपने गुनाहों को स्वीकार किया, तो क्या अब (यहाँ से) निकलने का भी कोई मार्ग है?"
ذٰلِكُمْ بِاَنَّهُٓ اِذَا دُعِيَ اللّٰهُ وَحْدَهُ كَفَرْتُمْۚ وَاِنْ يُشْرَكْ بِه۪ تُؤْمِنُواۜ فَالْحُكْمُ لِلّٰهِ الْعَلِيِّ الْكَب۪يرِ12
वह (बुरा परिणाम) तो इसलिए सामने आएगा कि जब अकेला अल्लाह को पुकारा जाता है तो तुम इनकार करते हो। किन्तु यदि उसके साथ साझी ठहराया जाए तो तुम मान लेते हो। तो अब फ़ैसला तो अल्लाह ही के हाथ में है, जो सर्वोच्च बड़ा महान है। -
هُوَ الَّذ۪ي يُر۪يكُمْ اٰيَاتِه۪ وَيُنَزِّلُ لَكُمْ مِنَ السَّمَٓاءِ رِزْقًاۜ وَمَا يَتَذَكَّرُ اِلَّا مَنْ يُن۪يبُ13
वही है जो तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है और तुम्हारे लिए आकाश से रोज़ी उतारता है, किन्तु याददिहानी तो बस वही हासिल करता है जो (उसकी ओर) रुजू करे
فَادْعُوا اللّٰهَ مُخْلِص۪ينَ لَهُ الدّ۪ينَ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ14
अतः तुम अल्लाह ही को, धर्म को उसी के लिए विशुद्ध करते हुए, पुकारो, यद्यपि इनकार करनेवालों को अप्रिय ही लगे। -
رَف۪يعُ الدَّرَجَاتِ ذُو الْعَرْشِۚ يُلْقِي الرُّوحَ مِنْ اَمْرِه۪ عَلٰى مَنْ يَشَٓاءُ مِنْ عِبَادِه۪ لِيُنْذِرَ يَوْمَ التَّلَاقِۙ15
वह ऊँचे दर्जोवाला, सिंहासनवाला है, अपने बन्दों में से जिसपर चाहता है, अपने हुक्म में से जिसपर चाहता है, अपने हुक्म से रूह उतारता है, ताकि वह मुलाक़ात के दिन से सावधान कर दे
يَوْمَ هُمْ بَارِزُونَۚ لَا يَخْفٰى عَلَى اللّٰهِ مِنْهُمْ شَيْءٌۜ لِمَنِ الْمُلْكُ الْيَوْمَۜ لِلّٰهِ الْوَاحِدِ الْقَهَّارِ16
जिस दिन वे खुले रूप में सामने उपस्थित होंगे, उनकी कोई चीज़ अल्लाह से छिपी न रहेगी, "आज किसकी बादशाही है?" "अल्लाह की, जो अकेला सबपर क़ाबू रखनेवाला है।"