48. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
2 · अल-बक़रा
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا تَدَايَنْتُمْ بِدَيْنٍ اِلٰٓى اَجَلٍ مُسَمًّى فَاكْتُبُوهُۜ وَلْيَكْتُبْ بَيْنَكُمْ كَاتِبٌ بِالْعَدْلِۖ وَلَا يَاْبَ كَاتِبٌ اَنْ يَكْتُبَ كَمَا عَلَّمَهُ اللّٰهُ فَلْيَكْتُبْۚ وَلْيُمْلِلِ الَّذ۪ي عَلَيْهِ الْحَقُّ وَلْيَتَّقِ اللّٰهَ رَبَّهُ وَلَا يَبْخَسْ مِنْهُ شَيْـًٔاۜ فَاِنْ كَانَ الَّذ۪ي عَلَيْهِ الْحَقُّ سَف۪يهًا اَوْ ضَع۪يفًا اَوْ لَا يَسْتَط۪يعُ اَنْ يُمِلَّ هُوَ فَلْيُمْلِلْ وَلِيُّهُ بِالْعَدْلِۜ وَاسْتَشْهِدُوا شَه۪يدَيْنِ مِنْ رِجَالِكُمْۚ فَاِنْ لَمْ يَكُونَا رَجُلَيْنِ فَرَجُلٌ وَامْرَاَتَانِ مِمَّنْ تَرْضَوْنَ مِنَ الشُّهَدَٓاءِ اَنْ تَضِلَّ اِحْدٰيهُمَا فَتُذَكِّرَ اِحْدٰيهُمَا الْاُخْرٰىۜ وَلَا يَاْبَ الشُّهَدَٓاءُ اِذَا مَا دُعُواۜ وَلَا تَسْـَٔمُٓوا اَنْ تَكْتُبُوهُ صَغ۪يرًا اَوْ كَب۪يرًا اِلٰٓى اَجَلِه۪ۜ ذٰلِكُمْ اَقْسَطُ عِنْدَ اللّٰهِ وَاَقْوَمُ لِلشَّهَادَةِ وَاَدْنٰٓى اَلَّا تَرْتَابُٓوا اِلَّٓا اَنْ تَكُونَ تِجَارَةً حَاضِرَةً تُد۪يرُونَهَا بَيْنَكُمْ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ اَلَّا تَكْتُبُوهَاۜ وَاَشْهِدُٓوا اِذَا تَبَايَعْتُمْۖ وَلَا يُضَٓارَّ كَاتِبٌ وَلَا شَه۪يدٌۜ وَاِنْ تَفْعَلُوا فَاِنَّهُ فُسُوقٌ بِكُمْۜ وَاتَّقُوا اللّٰهَۜ وَيُعَلِّمُكُمُ اللّٰهُۜ وَاللّٰهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ282
ऐ ईमान लानेवालो! जब किसी निश्चित अवधि के लिए आपस में ऋण का लेन-देन करो तो उसे लिख लिया करो और चाहिए कि कोई लिखनेवाला तुम्हारे बीच न्यायपूर्वक (दस्तावेज़) लिख दे। और लिखनेवाला लिखने से इनकार न करे; जिस प्रकार अल्लाह ने उसे सिखाया है, उसी प्रकार वह दूसरों के लिए लिखने के काम आए और बोलकर वह लिखाए जिसके ज़िम्मे हक़ की अदायगी हो। और उसे अल्लाह का, जो उसका रब है, डर रखना चाहिए और उसमें कोई कमी न करनी चाहिए। फिर यदि वह व्यक्ति जिसके ज़िम्मे हक़ की अदायगी हो, कम समझ या कमज़ोर हो या वह बोलकर न लिखा सकता हो तो उसके संरक्षक को चाहिए कि न्यायपूर्वक बोलकर लिखा दे। और अपने पुरुषों में से दो गवाहो को गवाह बना लो और यदि दो पुरुष न हों तो एक पुरुष और दो स्त्रियाँ, जिन्हें तुम गवाह के लिए पसन्द करो, गवाह हो जाएँ (दो स्त्रियाँ इसलिए रखी गई है) ताकि यदि एक भूल जाए तो दूसरी उसे याद दिला दे। और गवाहों को जब बुलाया जाए तो आने से इनकार न करें। मामला चाहे छोटा हो या बड़ा एक निर्धारित अवधि तक के लिए है, तो उसे लिखने में सुस्ती से काम न लो। यह अल्लाह की स्पष्ट से अधिक न्यायसंगत बात है और इससे गवाही भी अधिक ठीक रहती है। और इससे अधि क संभावना है कि तुम किसी संदेह में नहीं पड़ोगे। हाँ, यदि कोई सौदा नक़द हो, जिसका लेन-देन तुम आपस में कर रहे हो, तो तुम्हारे उसके न लिखने में तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं। और जब आपम में क्रय-विक्रय का मामला करो तो उस समय भी गवाह कर लिया करो, और न किसी लिखनेवाले को हानि पहुँचाए जाए और न किसी गवाह को। और यदि ऐसा करोगे तो यह तुम्हारे लिए अवज्ञा की बात होगी। और अल्लाह का डर रखो। अल्लाह तुम्हें शिक्षा दे रहा है। और अल्लाह हर चीज़ को जानता है