482. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

482. पृष्ठ
41 · हामीम अस-सजदा
اِلَيْهِ يُرَدُّ عِلْمُ السَّاعَةِۜ وَمَا تَخْرُجُ مِنْ ثَمَرَاتٍ مِنْ اَكْمَامِهَا وَمَا تَحْمِلُ مِنْ اُنْثٰى وَلَا تَضَعُ اِلَّا بِعِلْمِه۪ۜ وَيَوْمَ يُنَاد۪يهِمْ اَيْنَ شُرَكَٓاء۪يۙ قَالُٓوا اٰذَنَّاكَۙ مَا مِنَّا مِنْ شَه۪يدٍۚ47
उस घड़ी का ज्ञान अल्लाह की ओर फिरता है। जो फल भी अपने कोषों से निकलते है और जो मादा भी गर्भवती होती है और बच्चा जनती है, अनिवार्यतः उसे इन सबका ज्ञान होता है। जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा, "कहाँ है मेरे साझीदार?" वे कहेंगे, "हम तेरे समक्ष खुल्लम-ख़ुल्ला कह चुके है कि हममें से कोई भी इसका गवाह नहीं।"
وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَدْعُونَ مِنْ قَبْلُ وَظَنُّوا مَا لَهُمْ مِنْ مَح۪يصٍ48
और जिन्हें वे पहले पुकारा करते थे वे उनसे गुम हो जाएँगे। और वे समझ लेंगे कि उनके लिए कोई भी भागने की जगह नहीं है
لَا يَسْـَٔمُ الْاِنْسَانُ مِنْ دُعَٓاءِ الْخَيْرِۘ وَاِنْ مَسَّهُ الشَّرُّ فَيَؤُ۫سٌ قَنُوطٌ49
मनुष्य भलाई माँगने से नहीं उकताता, किन्तु यदि उसे कोई तकलीफ़ छू जाती है तो वह निराश होकर आस छोड़ बैठता है
وَلَئِنْ اَذَقْنَاهُ رَحْمَةً مِنَّا مِنْ بَعْدِ ضَرَّٓاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ هٰذَا ل۪يۙ وَمَٓا اَظُنُّ السَّاعَةَ قَٓائِمَةًۙ وَلَئِنْ رُجِعْتُ اِلٰى رَبّ۪ٓي اِنَّ ل۪ي عِنْدَهُ لَلْحُسْنٰىۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِمَا عَمِلُواۘ وَلَنُذ۪يقَنَّهُمْ مِنْ عَذَابٍ غَل۪يظٍ50
और यदि उस तकलीफ़ के बाद, जो उसे पहुँची, हम उसे अपनी दयालुता का आस्वादन करा दें तो वह निश्चय ही कहेंगा, "यह तो मेरा हक़ ही है। मैं तो यह नहीं समझता कि वह, क़ियामत की घड़ी, घटित होगी और यदि मैं अपने रब की ओर लौटाया भी गया तो अवश्य ही उसके पास मेरे लिए अच्छा पारितोषिक होगा।" फिर हम उन लोगों को जिन्होंने इनकार किया, अवश्य बताकर रहेंगे, जो कुछ उन्होंने किया होगा। और हम उन्हें अवश्य ही कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे
وَاِذَٓا اَنْعَمْنَا عَلَى الْاِنْسَانِ اَعْرَضَ وَنَاٰ بِجَانِبِه۪ۚ وَاِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ فَذُو دُعَٓاءٍ عَر۪يضٍ51
जब हम मनुष्य पर अनुकम्पा करते है तो वह ध्यान में नहीं लाता और अपना पहलू फेर लेता है। किन्तु जब उसे तकलीफ़ छू जाती है, तो वह लम्बी-चौड़ी प्रार्थनाएँ करने लगता है
قُلْ اَرَاَيْتُمْ اِنْ كَانَ مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ ثُمَّ كَفَرْتُمْ بِه۪ مَنْ اَضَلُّ مِمَّنْ هُوَ ف۪ي شِقَاقٍ بَع۪يدٍ52
कह दो, "क्या तुमने विचार किया, यदि वह (क़ुरआन) अल्लाह की ओर सो ही हुआ और तुमने उसका इनकार किया तो उससे बढ़कर भटका हुआ और कौन होगा जो विरोध में बहुत दूर जा पड़ा हो?"
سَنُر۪يهِمْ اٰيَاتِنَا فِي الْاٰفَاقِ وَف۪ٓي اَنْفُسِهِمْ حَتّٰى يَتَبَيَّنَ لَهُمْ اَنَّهُ الْحَقُّۜ اَوَلَمْ يَكْفِ بِرَبِّكَ اَنَّهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ شَه۪يدٌ53
शीघ्र ही हम उन्हें अपनी निशानियाँ वाह्य क्षेत्रों में दिखाएँगे और स्वयं उनके अपने भीतर भी, यहाँ तक कि उनपर स्पष्टा हो जाएगा कि वह (क़ुरआन) सत्य है। क्या तुम्हारा रब इस दृष्टि, से काफ़ी नहीं कि वह हर चीज़ का साक्षी है
اَلَٓا اِنَّهُمْ ف۪ي مِرْيَةٍ مِنْ لِقَٓاءِ رَبِّهِمْۜ اَلَٓا اِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ مُح۪يطٌ54
जान लो कि वे लोग अपने रब से मिलन के बारे में संदेह में पड़े हुए है। जान लो कि निश्चय ही वह हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है