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486. पृष्ठ
42 · अश-शूरा
ذٰلِكَ الَّذ۪ي يُبَشِّرُ اللّٰهُ عِبَادَهُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِۜ قُلْ لَٓا اَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ اَجْرًا اِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبٰىۜ وَمَنْ يَقْتَرِفْ حَسَنَةً نَزِدْ لَهُ ف۪يهَا حُسْنًاۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ شَكُورٌ23
उसी की शुभ सूचना अल्लाह अपने बन्दों को देता है जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। कहो, "मैं इसका तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता, बस निकटता का प्रेम-भाव चाहता हूँ, जो कोई नेकी कमाएगा हम उसके लिए उसमें अच्छाई की अभिवृद्धि करेंगे। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, गुणग्राहक है।"
اَمْ يَقُولُونَ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًاۚ فَاِنْ يَشَاِ اللّٰهُ يَخْتِمْ عَلٰى قَلْبِكَۜ وَيَمْحُ اللّٰهُ الْبَاطِلَ وَيُحِقُّ الْحَقَّ بِكَلِمَاتِه۪ۜ اِنَّهُ عَل۪يمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ24
(क्या वे ईमान नहीं लाएँगे) या उनका कहना है कि "इस व्यक्ति ने अल्लाह पर मिथ्यारोपण किया है?" यदि अल्लाह चाहे तो तुम्हारे दिल पर मुहर लगा दे (जिस प्रकार उसने इनकार करनेवालों के दिल पर मुहर लगा दी है) । अल्लाह तो असत्य को मिटा रहा है और सत्य को अपने बोलों से सिद्ध कर रहा है। निश्चय ही वह सीनों तक की बात को भी भली-भाँति जानता है
وَهُوَ الَّذ۪ي يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِه۪ وَيَعْفُوا عَنِ السَّيِّـَٔاتِ وَيَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَۙ25
वही है जो अपने बन्दों की तौबा क़बूल करता है और बुराइयों को माफ़ करता है, हालाँकि वह जानता है, जो कुछ तुम करते हो
وَيَسْتَج۪يبُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَيَز۪يدُهُمْ مِنْ فَضْلِه۪ۜ وَالْكَافِرُونَ لَهُمْ عَذَابٌ شَد۪يدٌ26
और वह उन लोगों की प्रार्थनाएँ स्वीकार करता है जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। और अपने उदार अनुग्रह से उन्हें और अधिक प्रदान करता है। रहे इनकार करनेवाले, तो उनके लिए कड़ा यातना है
وَلَوْ بَسَطَ اللّٰهُ الرِّزْقَ لِعِبَادِه۪ لَبَغَوْا فِي الْاَرْضِ وَلٰكِنْ يُنَزِّلُ بِقَدَرٍ مَا يَشَٓاءُۜ اِنَّهُ بِعِبَادِه۪ خَب۪يرٌ بَص۪يرٌ27
यदि अल्लाह अपने बन्दों के लिए रोज़ी कुशादा कर देता तो वे धरती में सरकशी करने लगते। किन्तु वह एक अंदाज़े के साथ जो चाहता है, उतारता है। निस्संदेह वह अपने बन्दों की ख़बर रखनेवाला है। वह उनपर निगाह रखता है
وَهُوَ الَّذ۪ي يُنَزِّلُ الْغَيْثَ مِنْ بَعْدِ مَا قَنَطُوا وَيَنْشُرُ رَحْمَتَهُۜ وَهُوَ الْوَلِيُّ الْحَم۪يدُ28
वही है जो इसके पश्चात कि लोग निराश हो चुके होते है, मेंह बरसाता है और अपनी दयालुता को फैला देता है। और वही है संरक्षक मित्र, प्रशंसनीय!
وَمِنْ اٰيَاتِه۪ خَلْقُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَمَا بَثَّ ف۪يهِمَا مِنْ دَٓابَّةٍۜ وَهُوَ عَلٰى جَمْعِهِمْ اِذَا يَشَٓاءُ قَد۪يرٌ۟29
और उसकी निशानियों में से है आकाशों और धरती को पैदा करना, और वे जीवधारी भी जो उसने इन दोनों में फैला रखे है। वह जब चाहे उन्हें इकट्ठा करने की सामर्थ्य भी रखता है
وَمَٓا اَصَابَكُمْ مِنْ مُص۪يبَةٍ فَبِمَا كَسَبَتْ اَيْد۪يكُمْ وَيَعْفُوا عَنْ كَث۪يرٍۜ30
जो मुसीबत तुम्हें पहुँची वह तो तुम्हारे अपने हाथों की कमाई से पहुँची और बहुत कुछ तो वह माफ़ कर देता है
وَمَٓا اَنْتُمْ بِمُعْجِز۪ينَ فِي الْاَرْضِۚ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَص۪يرٍ31
तुम धरती में काबू से निकल जानेवाले नहीं हो, और न अल्लाह से हटकर तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र है और न सहायक ही