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488. पृष्ठ
42 · अश-शूरा
وَتَرٰيهُمْ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا خَاشِع۪ينَ مِنَ الذُّلِّ يَنْظُرُونَ مِنْ طَرْفٍ خَفِيٍّۜ وَقَالَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنَّ الْخَاسِر۪ينَ الَّذ۪ينَ خَسِرُٓوا اَنْفُسَهُمْ وَاَهْل۪يهِمْ يَوْمَ الْقِيٰمَةِۜ اَلَٓا اِنَّ الظَّالِم۪ينَ ف۪ي عَذَابٍ مُق۪يمٍ45
और तुम उन्हें देखोगे कि वे उस (जहन्नम) पर इस दशा में लाए जा रहे है कि बेबसी और अपमान के कारण दबे हुए है। कनखियों से देख रहे है। जो लोग ईमान लाए, वे उस समय कहेंगे कि "निश्चय ही घाटे में पड़नेवाले वही है जिन्होंने क़ियामत के दिन अपने आपको और अपने लोगों को घाटे में डाल दिया। सावधान! निश्चय ही ज़ालिम स्थिर रहनेवाली यातना में होंगे
وَمَا كَانَ لَهُمْ مِنْ اَوْلِيَٓاءَ يَنْصُرُونَهُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِۜ وَمَنْ يُضْلِلِ اللّٰهُ فَمَا لَهُ مِنْ سَب۪يلٍۜ46
और उनके कुछ संरक्षक भी न होंगे, जो सहायता करके उन्हें अल्लाह से बचा सकें। जिसे अल्लाह गुमराही में डाल दे तो उसके लिए फिर कोई मार्ग नहीं।"
اِسْتَج۪يبُوا لِرَبِّكُمْ مِنْ قَبْلِ اَنْ يَاْتِيَ يَوْمٌ لَا مَرَدَّ لَهُ مِنَ اللّٰهِۜ مَا لَكُمْ مِنْ مَلْجَاٍ يَوْمَئِذٍ وَمَا لَكُمْ مِنْ نَك۪يرٍ47
अपने रब की बात मान लो इससे पहले कि अल्लाह की ओर से वह दिन आ जाए जो पलटने का नहीं। उस दिन तुम्हारे लिए न कोई शरण-स्थल होगा और न तुम किसी चीज़ को रद्द कर सकोगे
فَاِنْ اَعْرَضُوا فَمَٓا اَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَف۪يظًاۜ اِنْ عَلَيْكَ اِلَّا الْبَلَاغُۜ وَاِنَّٓا اِذَٓا اَذَقْنَا الْاِنْسَانَ مِنَّا رَحْمَةً فَرِحَ بِهَاۜ وَاِنْ تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ اَيْد۪يهِمْ فَاِنَّ الْاِنْسَانَ كَفُورٌ48
अब यदि वे ध्यान में न लाएँ तो हमने तो तुम्हें उनपर कोई रक्षक बनाकर तो भेजा नहीं है। तुमपर तो केवल (संदेश) पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है। हाल यह है कि जब हम मनुष्य को अपनी ओर से किसी दयालुता का आस्वादन कराते है तो वह उसपर इतराने लगता है, किन्तु ऐसे लोगों के हाथों ने जो कुछ आगे भेजा है उसके कारण यदि उन्हें कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो निश्चय ही वही मनुष्य बड़ा कृतघ्न बन जाता है
لِلّٰهِ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ يَخْلُقُ مَا يَشَٓاءُۜ يَهَبُ لِمَنْ يَشَٓاءُ اِنَاثًا وَيَهَبُ لِمَنْ يَشَٓاءُ الذُّكُورَۙ49
अल्लाह ही की है आकाशों और धरती की बादशाही। वह जो चाहता है पैदा करता है, जिसे चाहता है लड़कियाँ देता है और जिसे चाहता है लड़के देता है।
اَوْ يُزَوِّجُهُمْ ذُكْرَانًا وَاِنَاثًاۚ وَيَجْعَلُ مَنْ يَشَٓاءُ عَق۪يمًاۜ اِنَّهُ عَل۪يمٌ قَد۪يرٌ50
या उन्हें लड़के और लड़कियाँ मिला-जुलाकर देता है और जिसे चाहता है निस्संतान रखता है। निश्चय ही वह सर्वज्ञ, सामर्थ्यवान है
وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ اَنْ يُكَلِّمَهُ اللّٰهُ اِلَّا وَحْيًا اَوْ مِنْ وَرَٓائِ۬ حِجَابٍ اَوْ يُرْسِلَ رَسُولًا فَيُوحِيَ بِاِذْنِه۪ مَا يَشَٓاءُۜ اِنَّهُ عَلِيٌّ حَك۪يمٌ51
किसी मनुष्य की यह शान नहीं कि अल्लाह उससे बात करे, सिवाय इसके कि प्रकाशना के द्वारा या परदे के पीछे से (बात करे) । या यह कि वह एक रसूल (फ़रिश्ता) भेज दे, फिर वह उसकी अनुज्ञा से जो कुछ वह चाहता है प्रकाशना कर दे। निश्चय ही वह सर्वोच्च अत्यन्त तत्वदर्शी है