49. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
2 · अल-बक़रा
وَاِنْ كُنْتُمْ عَلٰى سَفَرٍ وَلَمْ تَجِدُوا كَاتِبًا فَرِهَانٌ مَقْبُوضَةٌۜ فَاِنْ اَمِنَ بَعْضُكُمْ بَعْضًا فَلْيُؤَدِّ الَّذِي اؤْتُمِنَ اَمَانَتَهُ وَلْيَتَّقِ اللّٰهَ رَبَّهُۜ وَلَا تَكْتُمُوا الشَّهَادَةَۜ وَمَنْ يَكْتُمْهَا فَاِنَّهُٓ اٰثِمٌ قَلْبُهُۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَل۪يمٌ۟283
और यदि तुम किसी सफ़र में हो और किसी लिखनेवाले को न पा सको, तो गिरवी रखकर मामला करो। फिर यदि तुममें से एक-दूसरे पर भरोसा के, तो जिस पर भरोसा किया है उसे चाहिए कि वह यह सच कर दिखाए कि वह विश्वासपात्र है और अल्लाह का, जो उसका रब है, डर रखे। और गवाही को न छिपाओ। जो उसे छिपाता है तो निश्चय ही उसका दिल गुनाहगार है, और तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है
لِلّٰهِ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۜ وَاِنْ تُبْدُوا مَا ف۪ٓي اَنْفُسِكُمْ اَوْ تُخْفُوهُ يُحَاسِبْكُمْ بِهِ اللّٰهُۜ فَيَغْفِرُ لِمَنْ يَشَٓاءُ وَيُعَذِّبُ مَنْ يَشَٓاءُۜ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ284
अल्लाह ही का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। और जो कुछ तुम्हारे मन है, यदि तुम उसे व्यक्त करो या छिपाओं, अल्लाह तुमसे उसका हिसाब लेगा। फिर वह जिसे चाहे क्षमा कर दे और जिसे चाहे यातना दे। अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
اٰمَنَ الرَّسُولُ بِمَٓا اُنْزِلَ اِلَيْهِ مِنْ رَبِّه۪ وَالْمُؤْمِنُونَۜ كُلٌّ اٰمَنَ بِاللّٰهِ وَمَلٰٓئِكَتِه۪ وَكُتُبِه۪ وَرُسُلِه۪ۜ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ اَحَدٍ مِنْ رُسُلِه۪۠ وَقَالُوا سَمِعْنَا وَاَطَعْنَا غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَاِلَيْكَ الْمَص۪يرُ285
रसूल उसपर, जो कुछ उसके रब की ओर से उसकी ओर उतरा, ईमान लाया और ईमानवाले भी, प्रत्येक, अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी किताबों पर और उसके रसूलों पर ईमान लाया। (और उनका कहना यह है,) "हम उसके रसूलों में से किसी को दूसरे रसूलों से अलग नहीं करते।" और उनका कहना है, "हमने सुना और आज्ञाकारी हुए। हमारे रब! हम तेरी क्षमा के इच्छुक है और तेरी ही ओर लौटना है।"
لَا يُكَلِّفُ اللّٰهُ نَفْسًا اِلَّا وُسْعَهَاۜ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْۜ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَٓا اِنْ نَس۪ينَٓا اَوْ اَخْطَاْنَاۚ رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَٓا اِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِنَاۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِه۪ۚ وَاعْفُ عَنَّا۠ وَاغْفِرْ لَنَا۠ وَارْحَمْنَا۠ اَنْتَ مَوْلٰينَا فَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِر۪ينَ286
अल्लाह किसी जीव पर बस उसकी सामर्थ्य और समाई के अनुसार ही दायित्व का भार डालता है। उसका है जो उसने कमाया और उसी पर उसका वबाल (आपदा) भी है जो उसने किया। "हमारे रब! यदि हम भूलें या चूक जाएँ तो हमें न पकड़ना। हमारे रब! और हम पर ऐसा बोझ न डाल जैसा तूने हमसे पहले के लोगों पर डाला था। हमारे रब! और हमसे वह बोझ न उठवा, जिसकी हमें शक्ति नहीं। और हमें क्षमा कर और हमें ढाँक ले, और हमपर दया कर। तू ही हमारा संरक्षक है, अतएव इनकार करनेवालों के मुक़ाबले में हमारी सहायता कर।"