52. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

52. पृष्ठ
3 · आले-इमरान
اَلَّذ۪ينَ يَقُولُونَ رَبَّنَٓا اِنَّنَٓا اٰمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَقِنَا عَذَابَ النَّارِۚ16
ये वे लोग है जो कहते है, "हमारे रब हम ईमान लाए है। अतः हमारे गुनाहों को क्षमा कर दे और हमें आग (जहन्नम) की यातना से बचा ले।"
اَلصَّابِر۪ينَ وَالصَّادِق۪ينَ وَالْقَانِت۪ينَ وَالْمُنْفِق۪ينَ وَالْمُسْتَغْفِر۪ينَ بِالْاَسْحَارِ17
ये लोग धैर्य से काम लेनेवाले, सत्यवान और अत्यन्त आज्ञाकारी है, ये ((अल्लाह के मार्ग में) खर्च करते और रात की अंतिम घड़ियों में क्षमा की प्रार्थनाएँ करते हैं
شَهِدَ اللّٰهُ اَنَّهُ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۙ وَالْمَلٰٓئِكَةُ وَاُو۬لُوا الْعِلْمِ قَٓائِمًا بِالْقِسْطِۜ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُۜ18
अल्लाह ने गवाही दी कि उसके सिवा कोई पूज्य नहीं; और फ़रिश्तों ने और उन लोगों ने भी जो न्याय और संतुलन स्थापित करनेवाली एक सत्ता को जानते है। उस प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी के सिवा कोई पूज्य नहीं
اِنَّ الدّ۪ينَ عِنْدَ اللّٰهِ الْاِسْلَامُ۠ وَمَا اخْتَلَفَ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْكِتَابَ اِلَّا مِنْ بَعْدِ مَا جَٓاءَهُمُ الْعِلْمُ بَغْيًا بَيْنَهُمْۜ وَمَنْ يَكْفُرْ بِاٰيَاتِ اللّٰهِ فَاِنَّ اللّٰهَ سَر۪يعُ الْحِسَابِ19
दीन (धर्म) तो अल्लाह की स्पष्ट में इस्लाम ही है। जिन्हें किताब दी गई थी, उन्होंने तो इसमें इसके पश्चात विभेद किया कि ज्ञान उनके पास आ चुका था। ऐसा उन्होंने परस्पर दुराग्रह के कारण किया। जो अल्लाह की आयतों का इनकार करेगा तो अल्लाह भी जल्द हिसाब लेनेवाला है
فَاِنْ حَٓاجُّوكَ فَقُلْ اَسْلَمْتُ وَجْهِيَ لِلّٰهِ وَمَنِ اتَّبَعَنِۜ وَقُلْ لِلَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْكِتَابَ وَالْاُمِّيّ۪نَ ءَاَسْلَمْتُمْۜ فَاِنْ اَسْلَمُوا فَقَدِ اهْتَدَوْاۚ وَاِنْ تَوَلَّوْا فَاِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلَاغُۜ وَاللّٰهُ بَص۪يرٌ بِالْعِبَادِ۟20
अब यदि वे तुमसे झगड़े तो कह दो, "मैंने और मेरे अनुयायियों ने तो अपने आपको अल्लाह के हवाले कर दिया हैं।" और जिन्हें किताब मिली थी और जिनके पास किताब नहीं है, उनसे कहो, "क्या तुम भी इस्लाम को अपनाते हो?" यदि वे इस्लाम को अंगीकार कर लें तो सीधा मार्ग पर गए। और यदि मुँह मोड़े तो तुमपर केवल (संदेश) पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है। और अल्लाह स्वयं बन्दों को देख रहा है
اِنَّ الَّذ۪ينَ يَكْفُرُونَ بِاٰيَاتِ اللّٰهِ وَيَقْتُلُونَ النَّبِيّ۪نَ بِغَيْرِ حَقٍّۙ وَيَقْتُلُونَ الَّذ۪ينَ يَاْمُرُونَ بِالْقِسْطِ مِنَ النَّاسِۙ فَبَشِّرْهُمْ بِعَذَابٍ اَل۪يمٍ21
जो लोग अल्लाह की आयतों का इनकार करें और नबियों को नाहक क़त्ल करे और उन लोगों का क़ल्त करें जो न्याय के पालन करने को कहें, उनको दुखद यातना की मंगल सूचना दे दो
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ حَبِطَتْ اَعْمَالُهُمْ فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِۘ وَمَا لَهُمْ مِنْ نَاصِر۪ينَ22
यही लोग हैं, जिनके कर्म दुनिया और आख़िरत में अकारथ गए और उनका सहायक कोई भी नहीं