520. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

520. पृष्ठ
50 · काफ
وَكَمْ اَهْلَكْنَا قَبْلَهُمْ مِنْ قَرْنٍ هُمْ اَشَدُّ مِنْهُمْ بَطْشًا فَنَقَّبُوا فِي الْبِلَادِۜ هَلْ مِنْ مَح۪يصٍ36
उनसे पहले हम कितनी ही नस्लों को विनष्ट कर चुके है। वे लोग शक्ति में उनसे कहीं बढ़-चढ़कर थे। (पनाह की तलाश में) उन्होंने नगरों को छान मारा, कोई है भागने को ठिकाना?
اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَذِكْرٰى لِمَنْ كَانَ لَهُ قَلْبٌ اَوْ اَلْقَى السَّمْعَ وَهُوَ شَه۪يدٌ37
निश्चय ही इसमें उस व्यक्ति के लिए शिक्षा-सामग्री है जिसके पास दिल हो या वह (दिल से) हाजिर रहकर कान लगाए
وَلَقَدْ خَلَقْنَا السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا ف۪ي سِتَّةِ اَيَّامٍۗ وَمَا مَسَّنَا مِنْ لُغُوبٍ38
हमने आकाशों और धरती को और जो कुछ उनके बीच है छः दिनों में पैदा कर दिया और हमें कोई थकान न छू सकी
فَاصْبِرْ عَلٰى مَا يَقُولُونَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوعِ الشَّمْسِ وَقَبْلَ الْغُرُوبِۚ39
अतः जो कुछ वे कहते है उसपर धैर्य से काम लो और अपने रब की प्रशंसा की तसबीह करो; सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के पूर्व,
وَمِنَ الَّيْلِ فَسَبِّحْهُ وَاَدْبَارَ السُّجُودِ40
और रात की घड़ियों में फिर उसकी तसबीह करो और सजदों के पश्चात भी
وَاسْتَمِعْ يَوْمَ يُنَادِ الْمُنَادِ مِنْ مَكَانٍ قَر۪يبٍۙ41
और कान लगाकर सुन लेगा जिस दिन पुकारनेवाला अत्यन्त निकट के स्थान से पुकारेगा,
يَوْمَ يَسْمَعُونَ الصَّيْحَةَ بِالْحَقِّۜ ذٰلِكَ يَوْمُ الْخُرُوجِ42
जिस दिन लोग भयंकर चीख़ को सत्यतः सुन रहे होंगे। वही दिन होगा निकलने का।-
اِنَّا نَحْنُ نُحْي۪ وَنُم۪يتُ وَاِلَيْنَا الْمَص۪يرُۙ43
हम ही जीलन प्रदान करते और मृत्यु देते है और हमारी ही ओर अन्ततः आना है। -
يَوْمَ تَشَقَّقُ الْاَرْضُ عَنْهُمْ سِرَاعًاۜ ذٰلِكَ حَشْرٌ عَلَيْنَا يَس۪يرٌ44
जिस दिन धरती उनपर से फट जाएगी और वे तेजी से निकल पड़ेंगे। यह इकट्ठा करना हमारे लिए अत्यन्त सरल है
نَحْنُ اَعْلَمُ بِمَا يَقُولُونَ وَمَٓا اَنْتَ عَلَيْهِمْ بِجَبَّارٍ فَذَكِّرْ بِالْقُرْاٰنِ مَنْ يَخَافُ وَع۪يدِ45
हम जानते है जो कुछ वे कहते है, तुम उनपर कोई ज़बरदस्ती करनेवाले तो हो नहीं। अतः तुम क़ुरआन के द्वारा उसे नसीहत करो जो हमारी चेतावनी से डरे
51 · अज़-ज़ारियात
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالذَّارِيَاتِ ذَرْوًاۙ1
गवाह है (हवाएँ) जो गर्द-ग़ुबार उड़ाती फिरती है;
فَالْحَامِلَاتِ وِقْرًاۙ2
फिर बोझ उठाती है;
فَالْجَارِيَاتِ يُسْرًاۙ3
फिर नरमी से चलती है;
فَالْمُقَسِّمَاتِ اَمْرًاۙ4
फिर मामले को अलग-अलग करती है;
اِنَّمَا تُوعَدُونَ لَصَادِقٌۙ5
निश्चय ही तुमसे जिस चीज़ का वादा किया जाता है, वह सत्य है;
وَاِنَّ الدّ۪ينَ لَوَاقِعٌۜ6
और (कर्मों का) बदला अवश्य सामने आकर रहेगा