53. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

53. पृष्ठ
3 · आले-इमरान
اَلَمْ تَرَ اِلَى الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا نَص۪يبًا مِنَ الْكِتَابِ يُدْعَوْنَ اِلٰى كِتَابِ اللّٰهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ يَتَوَلّٰى فَر۪يقٌ مِنْهُمْ وَهُمْ مُعْرِضُونَ23
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्हें ईश-ग्रंथ का एक हिस्सा प्रदान हुआ। उन्हें अल्लाह की किताब की ओर बुलाया जाता है कि वह उनके बीच निर्णय करे, फिर भी उनका एक गिरोह (उसकी) उपेक्षा करते हुए मुँह फेर लेता है?
ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ قَالُوا لَنْ تَمَسَّنَا النَّارُ اِلَّٓا اَيَّامًا مَعْدُودَاتٍۖ وَغَرَّهُمْ ف۪ي د۪ينِهِمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ24
यह इसलिए कि वे कहते, "आग हमें नहीं छू सकती। हाँ, कुछ गिने-चुने दिनों (के कष्टों) की बात और है।" उनकी मनघड़ंत बातों ने, जो वे घड़ते रहे हैं, उन्हें धोखे में डाल रखा है
فَكَيْفَ اِذَا جَمَعْنَاهُمْ لِيَوْمٍ لَا رَيْبَ ف۪يهِ وَوُفِّيَتْ كُلُّ نَفْسٍ مَا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ25
फिर क्या हाल होगा, जब हम उन्हें उस दिन इकट्ठा करेंगे, जिसके आने में कोई संदेह नहीं और प्रत्येक व्यक्ति को, जो कुछ उसने कमाया होगा, पूरा-पूरा मिल जाएगा; और उनके साथ अन्याय न होगा
قُلِ اللّٰهُمَّ مَالِكَ الْمُلْكِ تُؤْتِي الْمُلْكَ مَنْ تَشَٓاءُ وَتَنْزِعُ الْمُلْكَ مِمَّنْ تَشَٓاءُۘ وَتُعِزُّ مَنْ تَشَٓاءُ وَتُذِلُّ مَنْ تَشَٓاءُۜ بِيَدِكَ الْخَيْرُۜ اِنَّكَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ26
कहो, "ऐ अल्लाह, राज्य के स्वामी! तू जिसे चाहे राज्य दे और जिससे चाहे राज्य छीन ले, और जिसे चाहे इज़्ज़त (प्रभुत्व) प्रदान करे और जिसको चाहे अपमानित कर दे। तेरे ही हाथ में भलाई है। निस्संदेह तुझे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
تُولِجُ الَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَتُولِجُ النَّهَارَ فِي الَّيْلِۘ وَتُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَتُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّۘ وَتَرْزُقُ مَنْ تَشَٓاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ27
"तू रात को दिन में पिरोता है और दिन को रात में पिरोता है। तू निर्जीव से सजीव को निकालता है और सजीव से निर्जीव को निकालता है, बेहिसाब देता है।"
لَا يَتَّخِذِ الْمُؤْمِنُونَ الْكَافِر۪ينَ اَوْلِيَٓاءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِن۪ينَۚ وَمَنْ يَفْعَلْ ذٰلِكَ فَلَيْسَ مِنَ اللّٰهِ ف۪ي شَيْءٍ اِلَّٓا اَنْ تَتَّقُوا مِنْهُمْ تُقٰيةًۜ وَيُحَذِّرُكُمُ اللّٰهُ نَفْسَهُۜ وَاِلَى اللّٰهِ الْمَص۪يرُ28
ईमानवालों को चाहिए कि वे ईमानवालों से हटकर इनकारवालों को अपना मित्र (राज़दार) न बनाएँ, और जो ऐसा करेगा, उसका अल्लाह से कोई सम्बन्ध नहीं, क्योंकि उससे सम्बद्ध यही बात है कि तुम उनसे बचो, जिस प्रकार वे तुमसे बचते है। और अल्लाह तुम्हें अपने आपसे डराता है, और अल्लाह ही की ओर लौटना है
قُلْ اِنْ تُخْفُوا مَا ف۪ي صُدُورِكُمْ اَوْ تُبْدُوهُ يَعْلَمْهُ اللّٰهُۜ وَيَعْلَمُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۜ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ29
कह दो, "यदि तुम अपने दिलों की बात छिपाओ या उसे प्रकट करो, प्रत्येक दशा में अल्लाह उसे जान लेगा। और वह उसे भी जानता है, जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। और अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।"