541. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
57 · अल-हदीद
لَقَدْ اَرْسَلْنَا رُسُلَنَا بِالْبَيِّنَاتِ وَاَنْزَلْنَا مَعَهُمُ الْكِتَابَ وَالْم۪يزَانَ لِيَقُومَ النَّاسُ بِالْقِسْطِۚ وَاَنْزَلْنَا الْحَد۪يدَ ف۪يهِ بَاْسٌ شَد۪يدٌ وَمَنَافِعُ لِلنَّاسِ وَلِيَعْلَمَ اللّٰهُ مَنْ يَنْصُرُهُ وَرُسُلَهُ بِالْغَيْبِۜ اِنَّ اللّٰهَ قَوِيٌّ عَز۪يزٌ۟25
निश्चय ही हमने अपने रसूलों को स्पष्ट प्रमाणों के साथ भेजा और उनके लिए किताब और तुला उतारी, ताकि लोग इनसाफ़ पर क़ायम हों। और लोहा भी उतारा, जिसमें बड़ी दहशत है और लोगों के लिए कितने ही लाभ है., और (किताब एवं तुला इसलिए भी उतारी) ताकि अल्लाह जान ले कि कौन परोक्ष में रहते हुए उसकी और उसके रसूलों की सहायता करता है। निश्चय ही अल्लाह शक्तिशाली, प्रभुत्वशाली है
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَا نُوحًا وَاِبْرٰه۪يمَ وَجَعَلْنَا ف۪ي ذُرِّيَّتِهِمَا النُّبُوَّةَ وَالْكِتَابَ فَمِنْهُمْ مُهْتَدٍۚ وَكَث۪يرٌ مِنْهُمْ فَاسِقُونَ26
हमने नूह और इबराहीम को भेजा और उन दोनों की सन्तान में पैग़म्बरी और क़िताब रख दी। फिर उनमें से किसी ने तो संमार्ग अपनाया; किन्तु उनमें से अधिकतर अवज्ञाकारी थे
ثُمَّ قَفَّيْنَا عَلٰٓى اٰثَارِهِمْ بِرُسُلِنَا وَقَفَّيْنَا بِع۪يسَى ابْنِ مَرْيَمَ وَاٰتَيْنَاهُ الْاِنْج۪يلَ وَجَعَلْنَا ف۪ي قُلُوبِ الَّذ۪ينَ اتَّبَعُوهُ رَاْفَةً وَرَحْمَةًۜ وَرَهْبَانِيَّةًۨ ابْتَدَعُوهَا مَا كَتَبْنَاهَا عَلَيْهِمْ اِلَّا ابْتِغَٓاءَ رِضْوَانِ اللّٰهِ فَمَا رَعَوْهَا حَقَّ رِعَايَتِهَاۚ فَاٰتَيْنَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مِنْهُمْ اَجْرَهُمْۚ وَكَث۪يرٌ مِنْهُمْ فَاسِقُونَ27
फिर उनके पीछ उन्हीं के पद-चिन्हों पर हमने अपने दूसरे रसूलों को भेजा और हमने उनके पीछे मरयम के बेटे ईसा को भेजा और उसे इंजील प्रदान की। और जिन लोगों ने उसका अनुसरण किया, उनके दिलों में हमने करुणा और दया रख दी। रहा संन्यास, तो उसे उन्होंने स्वयं घड़ा था। हमने उसे उनके लिए अनिवार्य नहीं किया था, यदि अनिवार्य किया था तो केवल अल्लाह की प्रसन्नता की चाहत। फिर वे उसका निर्वाह न कर सकें, जैसा कि उनका निर्वाह करना चाहिए था। अतः उन लोगों को, जो उनमें से वास्तव में ईमान लाए थे, उनका बदला हमने (उन्हें) प्रदान किया। किन्तु उनमें से अधिकतर अवज्ञाकारी ही है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اتَّقُوا اللّٰهَ وَاٰمِنُوا بِرَسُولِه۪ يُؤْتِكُمْ كِفْلَيْنِ مِنْ رَحْمَتِه۪ وَيَجْعَلْ لَكُمْ نُورًا تَمْشُونَ بِه۪ وَيَغْفِرْ لَكُمْۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌۙ28
ऐ लोगों, जो ईमान लाए हो! अल्लाह का डर रखो और उसके रसूल पर ईमान लाओ। वह तुम्हें अपनी दयालुता का दोहरा हिस्सा प्रदान करेगा और तुम्हारे लिए एक प्रकाश कर देगा, जिसमें तुम चलोगे और तुम्हें क्षमा कर देगा। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
لِئَلَّا يَعْلَمَ اَهْلُ الْكِتَابِ اَلَّا يَقْدِرُونَ عَلٰى شَيْءٍ مِنْ فَضْلِ اللّٰهِ وَاَنَّ الْفَضْلَ بِيَدِ اللّٰهِ يُؤْت۪يهِ مَنْ يَشَٓاءُۜ وَاللّٰهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظ۪يمِ29
ताकि किताबवाले यह न समझें कि अल्लाह के अनुग्रह में से वे किसी चीज़ पर अधिकार न प्राप्त कर सकेंगे और यह कि अनुग्रह अल्लाह के हाथ में है, जिसे चाहता है प्रदान करता है। अल्लाह बड़े अनुग्रह का मालिक है