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546. पृष्ठ
59 · अल-हश्र
ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ شَٓاقُّوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُۚ وَمَنْ يُشَٓاقِّ اللّٰهَ فَاِنَّ اللّٰهَ شَد۪يدُ الْعِقَابِ4
यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का मुक़ाला करने की कोशिश की। और जो कोई अल्लाह का मुक़ाबला करता है तो निश्चय ही अल्लाह की यातना बहुत कठोर है
مَا قَطَعْتُمْ مِنْ ل۪ينَةٍ اَوْ تَرَكْتُمُوهَا قَٓائِمَةً عَلٰٓى اُصُولِهَا فَبِاِذْنِ اللّٰهِ وَلِيُخْزِيَ الْفَاسِق۪ينَ5
तुमने खजूर के जो वृक्ष काटे या उन्हें उनकी जड़ों पर खड़ा छोड़ दिया तो यह अल्लाह ही की अनुज्ञा से हुआ (ताकि ईमानवालों के लिए आसानी पैदा करे) और इसलिए कि वह अवज्ञाकारियों को रुसवा करे
وَمَٓا اَفَٓاءَ اللّٰهُ عَلٰى رَسُولِه۪ مِنْهُمْ فَمَٓا اَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍ وَلَا رِكَابٍ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ يُسَلِّطُ رُسُلَهُ عَلٰى مَنْ يَشَٓاءُۜ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ6
और अल्लाह ने उनसे लेकर अपने रसूल की ओर जो कुछ पलटाया, उसके लिए न तो तुमने घोड़े दौड़ाए और न ऊँट। किन्तु अल्लाह अपने रसूलों को जिसपर चाहता है प्रभुत्व प्रदान कर देता है। अल्लाह को तो हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्ति है
مَٓا اَفَٓاءَ اللّٰهُ عَلٰى رَسُولِه۪ مِنْ اَهْلِ الْقُرٰى فَلِلّٰهِ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبٰى وَالْيَتَامٰى وَالْمَسَاك۪ينِ وَابْنِ السَّب۪يلِۙ كَيْ لَا يَكُونَ دُولَةً بَيْنَ الْاَغْنِيَٓاءِ مِنْكُمْۜ وَمَٓا اٰتٰيكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهٰيكُمْ عَنْهُ فَانْتَهُواۚ وَاتَّقُوا اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ شَد۪يدُ الْعِقَابِۢ7
जो कुछ अल्लाह ने अपने रसूल की ओर बस्तियोंवालों से लेकर पलटाया वह अल्लाह और रसूल और (मुहताज) नातेदार और अनाथों और मुहताजों और मुसाफ़िर के लिए है, ताकि वह (माल) तुम्हारे मालदारों ही के बीच चक्कर न लगाता रहे - रसूल जो कुछ तुम्हें दे उसे ले लो और जिस चीज़ से तुम्हें रोक दे उससे रुक जाओ, और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह की यातना बहुत कठोर है। -
لِلْفُقَرَٓاءِ الْمُهَاجِر۪ينَ الَّذ۪ينَ اُخْرِجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ وَاَمْوَالِهِمْ يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِنَ اللّٰهِ وَرِضْوَانًا وَيَنْصُرُونَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَۚ8
वह ग़रीब मुहाजिरों के लिए है, जो अपने घरों और अपने मालों से इस हालत में निकाल बाहर किए गए है कि वे अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी प्रसन्नता की तलाश में है और अल्लाह और उसके रसूल की सहायता कर रहे है, और वही वास्तव में सच्चे है
وَالَّذ۪ينَ تَبَوَّؤُ الدَّارَ وَالْا۪يمَانَ مِنْ قَبْلِهِمْ يُحِبُّونَ مَنْ هَاجَرَ اِلَيْهِمْ وَلَا يَجِدُونَ ف۪ي صُدُورِهِمْ حَاجَةً مِمَّٓا اُو۫تُوا وَيُؤْثِرُونَ عَلٰٓى اَنْفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌۜ وَمَنْ يُوقَ شُحَّ نَفْسِه۪ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَۚ9
और उनके लिए जो उनसे पहले ही से हिजरत के घर (मदीना) में ठिकाना बनाए हुए है और ईमान पर जमे हुए है, वे उनसे प्रेम करते है जो हिजरत करके उनके यहाँ आए है और जो कुछ भी उन्हें दिया गया उससे वे अपने सीनों में कोई खटक नहीं पाते और वे उन्हें अपने मुक़ाबले में प्राथमिकता देते है, यद्यपि अपनी जगह वे स्वयं मुहताज ही हों। और जो अपने मन के लोभ और कृपणता से बचा लिया जाए ऐसे लोग ही सफल है