549. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
60 · अल-मुमतहिना
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا عَدُوّ۪ي وَعَدُوَّكُمْ اَوْلِيَٓاءَ تُلْقُونَ اِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوا بِمَا جَٓاءَكُمْ مِنَ الْحَقِّۚ يُخْرِجُونَ الرَّسُولَ وَاِيَّاكُمْ اَنْ تُؤْمِنُوا بِاللّٰهِ رَبِّكُمْۜ اِنْ كُنْتُمْ خَرَجْتُمْ جِهَادًا ف۪ي سَب۪يل۪ي وَابْتِغَٓاءَ مَرْضَات۪ي تُسِرُّونَ اِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِۗ وَاَنَا۬ اَعْلَمُ بِمَٓا اَخْفَيْتُمْ وَمَٓا اَعْلَنْتُمْۜ وَمَنْ يَفْعَلْهُ مِنْكُمْ فَقَدْ ضَلَّ سَوَٓاءَ السَّب۪يلِ1
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुम मेरे मार्ग में जिहाद के लिए और मेरी प्रसन्नता की तलाश में निकले हो तो मेरे शत्रुओं और अपने शत्रुओं को मित्र न बनाओ कि उनके प्रति प्रेम दिखाओं, जबकि तुम्हारे पास जो सत्य आया है उसका वे इनकार कर चुके है। वे रसूल को और तुम्हें इसलिए निर्वासित करते है कि तुम अपने रब - अल्लाह पर ईमान लाए हो। तुम गुप्त रूप से उनसे मित्रता की बातें करते हो। हालाँकि मैं भली-भाँति जानता हूँ जो कुछ तुम छिपाते हो और व्यक्त करते हो। और जो कोई भी तुममें से भटक गया
اِنْ يَثْقَفُوكُمْ يَكُونُوا لَكُمْ اَعْدَٓاءً وَيَبْسُطُٓوا اِلَيْكُمْ اَيْدِيَهُمْ وَاَلْسِنَتَهُمْ بِالسُّٓوءِ وَوَدُّوا لَوْ تَكْفُرُونَۜ2
यदि वे तुम्हें पा जाएँ तो तुम्हारे शत्रु हो जाएँ और कष्ट पहुँचाने के लिए तुमपर हाथ और ज़बान चलाएँ। वे तो चाहते है कि काश! तुम भी इनकार करनेवाले हो जाओ
لَنْ تَنْفَعَكُمْ اَرْحَامُكُمْ وَلَٓا اَوْلَادُكُمْۚۛ يَوْمَ الْقِيٰمَةِۚۛ يَفْصِلُ بَيْنَكُمْۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ3
क़ियामत के दिन तुम्हारी नातेदारियाँ कदापि तुम्हें लाभ न पहुँचाएँगी और न तुम्हारी सन्तान ही। उस दिन वह (अल्लाह) तुम्हारे बीच जुदाई डाल देगा। जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उसे देख रहा होता है
قَدْ كَانَتْ لَكُمْ اُسْوَةٌ حَسَنَةٌ ف۪ٓي اِبْرٰه۪يمَ وَالَّذ۪ينَ مَعَهُۚ اِذْ قَالُوا لِقَوْمِهِمْ اِنَّا بُرَءٰٓؤُ۬ا مِنْكُمْ وَمِمَّا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِۘ كَفَرْنَا بِكُمْ وَبَدَا بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةُ وَالْبَغْضَٓاءُ اَبَدًا حَتّٰى تُؤْمِنُوا بِاللّٰهِ وَحْدَهُٓ اِلَّا قَوْلَ اِبْرٰه۪يمَ لِاَب۪يهِ لَاَسْتَغْفِرَنَّ لَكَ وَمَٓا اَمْلِكُ لَكَ مِنَ اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍۜ رَبَّنَا عَلَيْكَ تَوَكَّلْنَا وَاِلَيْكَ اَنَبْنَا وَاِلَيْكَ الْمَص۪يرُ4
तुम लोगों के लिए इबराहीम में और उन लोगों में जो उसके साथ थे अच्छा आदर्श है, जबकि उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कह दिया कि "हम तुमसे और अल्लाह से हटकर जिन्हें तुम पूजते हो उनसे विरक्त है। हमने तुम्हारा इनकार किया और हमारे और तुम्हारे बीच सदैव के लिए वैर और विद्वेष प्रकट हो चुका जब तक अकेले अल्लाह पर तुम ईमान न लाओ।" इूबराहीम का अपने बाप से यह कहना अपवाद है कि "मैं आपके लिए क्षमा की प्रार्थना अवश्य करूँगा, यद्यपि अल्लाह के मुक़ाबले में आपके लिए मैं किसी चीज़ पर अधिकार नहीं रखता।" "ऐ हमारे रब! हमने तुझी पर भरोसा किया और तेरी ही ओर रुजू हुए और तेरी ही ओर अन्त में लौटना हैं। -
رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِلَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَاغْفِرْ لَنَا رَبَّنَاۚ اِنَّكَ اَنْتَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ5
"ऐ हमारे रब! हमें इनकार करनेवालों के लिए फ़ितना न बना और ऐ हमारे रब! हमें क्षमा कर दे। निश्चय ही तू प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।"