550. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
60 · अल-मुमतहिना
لَقَدْ كَانَ لَكُمْ ف۪يهِمْ اُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُوا اللّٰهَ وَالْيَوْمَ الْاٰخِرَۜ وَمَنْ يَتَوَلَّ فَاِنَّ اللّٰهَ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَم۪يدُ۟6
निश्चय ही तुम्हारे लिए उनमें अच्छा आदर्श है और हर उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और अंतिम दिन की आशा रखता हो। और जो कोई मुँह फेरे तो अल्लाह तो निस्पृह, अपने आप में स्वयं प्रशंसित है
عَسَى اللّٰهُ اَنْ يَجْعَلَ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَ الَّذ۪ينَ عَادَيْتُمْ مِنْهُمْ مَوَدَّةًۜ وَاللّٰهُ قَد۪يرٌۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ7
आशा है कि अल्लाह तुम्हारे और उनके बीच, जिनके बीच, जिनसे तुमने शत्रुता मोल ली है, प्रेम-भाव उत्पन्न कर दे। अल्लाह बड़ी सामर्थ्य रखता है और अल्लाह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
لَا يَنْهٰيكُمُ اللّٰهُ عَنِ الَّذ۪ينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدّ۪ينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ اَنْ تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُٓوا اِلَيْهِمْۜ اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُقْسِط۪ينَ8
अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है
اِنَّمَا يَنْهٰيكُمُ اللّٰهُ عَنِ الَّذ۪ينَ قَاتَلُوكُمْ فِي الدّ۪ينِ وَاَخْرَجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ وَظَاهَرُوا عَلٰٓى اِخْرَاجِكُمْ اَنْ تَوَلَّوْهُمْۚ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ9
अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की। जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا جَٓاءَكُمُ الْمُؤْمِنَاتُ مُهَاجِرَاتٍ فَامْتَحِنُوهُنَّۜ اَللّٰهُ اَعْلَمُ بِا۪يمَانِهِنَّۚ فَاِنْ عَلِمْتُمُوهُنَّ مُؤْمِنَاتٍ فَلَا تَرْجِعُوهُنَّ اِلَى الْكُفَّارِۜ لَا هُنَّ حِلٌّ لَهُمْ وَلَا هُمْ يَحِلُّونَ لَهُنَّۜ وَاٰتُوهُمْ مَٓا اَنْفَقُواۜ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ اَنْ تَنْكِحُوهُنَّ اِذَٓا اٰتَيْتُمُوهُنَّ اُجُورَهُنَّۜ وَلَا تُمْسِكُوا بِعِصَمِ الْكَوَافِرِ وَسْـَٔلُوا مَٓا اَنْفَقْتُمْ وَلْيَسْـَٔلُوا مَٓا اَنْفَقُواۜ ذٰلِكُمْ حُكْمُ اللّٰهِۜ يَحْكُمُ بَيْنَكُمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ10
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम्हारे पास ईमान की दावेदार स्त्रियाँ हिजरत करके आएँ तो तुम उन्हें जाँच लिया करो। यूँ तो अल्लाह उनके ईमान से भली-भाँति परिचित है। फिर यदि वे तुम्हें ईमानवाली मालूम हो, तो उन्हें इनकार करनेवालों (अधर्मियों) की ओर न लौटाओ। न तो वे स्त्रियाँ उनके लिए वैद्य है और न वे उन स्त्रियों के लिए वैद्य है। और जो कुछ उन्होंने ख़र्च किया हो तुम उन्हें दे दो और इसमें तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं कि तुम उनसे विवाह कर लो, जबकि तुम उन्हें महर अदा कर दो। और तुम स्वयं भी इनकार करनेवाली स्त्रियों के सतीत्व को अपने अधिकार में न रखो। और जो कुछ तुमने ख़र्च किया हो माँग लो। और उन्हें भी चाहिए कि जो कुछ उन्होंने ख़र्च किया हो माँग ले। यह अल्लाह का आदेश है। वह तुम्हारे बीच फ़ैसला करता है। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
وَاِنْ فَاتَكُمْ شَيْءٌ مِنْ اَزْوَاجِكُمْ اِلَى الْكُفَّارِ فَعَاقَبْتُمْ فَاٰتُوا الَّذ۪ينَ ذَهَبَتْ اَزْوَاجُهُمْ مِثْلَ مَٓا اَنْفَقُواۜ وَاتَّقُوا اللّٰهَ الَّذ۪ٓي اَنْتُمْ بِه۪ مُؤْمِنُونَ11
और यदि तुम्हारी पत्नि यो (के मह्रों) में से कुछ तुम्हारे हाथ से निकल जाए और इनकार करनेवालों (अधर्मियों) की ओर रह जाए, फिर तुम्हारी नौबत आए, जो जिन लोगों की पत्नियों चली गई है, उन्हें जितना उन्होंने ख़र्च किया हो दे दो। और अल्लाह का डर रखो, जिसपर तुम ईमान रखते हो