551. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
60 · अल-मुमतहिना61 · अस-सफ्फ़
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ اِذَا جَٓاءَكَ الْمُؤْمِنَاتُ يُبَايِعْنَكَ عَلٰٓى اَنْ لَا يُشْرِكْنَ بِاللّٰهِ شَيْـًٔا وَلَا يَسْرِقْنَ وَلَا يَزْن۪ينَ وَلَا يَقْتُلْنَ اَوْلَادَهُنَّ وَلَا يَاْت۪ينَ بِبُهْتَانٍ يَفْتَر۪ينَهُ بَيْنَ اَيْد۪يهِنَّ وَاَرْجُلِهِنَّ وَلَا يَعْص۪ينَكَ ف۪ي مَعْرُوفٍ فَبَايِعْهُنَّ وَاسْتَغْفِرْ لَهُنَّ اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ12
ऐ नबी! जब तुम्हारे पास ईमानवाली स्त्रियाँ आकर तुमसे इसपर 'बैअत' करे कि वे अल्लाह के साथ किसी चीज़ को साझी नहीं ठहराएँगी और न चोरी करेंगी और न व्यभिचार करेंगी, और न अपनी औलाद की हत्या करेंगी और न अपने हाथों और पैरों को बीच कोई आरोप घड़कर लाएँगी. और न किसी भले काम में तुम्हारी अवज्ञा करेंगी, तो उनसे 'बैअत' ले लो और उनके लिए अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करो। निश्चय ही अत्यन्त बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَتَوَلَّوْا قَوْمًا غَضِبَ اللّٰهُ عَلَيْهِمْ قَدْ يَئِسُوا مِنَ الْاٰخِرَةِ كَمَا يَئِسَ الْكُفَّارُ مِنْ اَصْحَابِ الْقُبُورِ13
ऐ ईमान लानेवालो! ऐसे लोगों से मित्रता न करो जिनपर अल्लाह का प्रकोप हुआ, वे आख़िरत से निराश हो चुके है, जिस प्रकार इनकार करनेवाले क़ब्रवालों से निराश हो चुके है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
سَبَّحَ لِلّٰهِ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۚ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ1
अल्लाह की तसबीह की हर उस चीज़ ने जो आकाशों और धरती में है। वही प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لِمَ تَقُولُونَ مَا لَا تَفْعَلُونَ2
ऐ ईमान लानेवालो! तुम वह बात क्यों कहते हो जो करते नहीं?
كَبُرَ مَقْتًا عِنْدَ اللّٰهِ اَنْ تَقُولُوا مَا لَا تَفْعَلُونَ3
अल्लाह के यहाँ यह अत्यन्त अप्रिय बात है कि तुम वह बात कहो, जो करो नहीं
اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الَّذ۪ينَ يُقَاتِلُونَ ف۪ي سَب۪يلِه۪ صَفًّا كَاَنَّهُمْ بُنْيَانٌ مَرْصُوصٌ4
अल्लाह तो उन लोगों से प्रेम रखता है जो उसके मार्ग में पंक्तिबद्ध होकर लड़ते है मानो वे सीसा पिलाई हुए दीवार है
وَاِذْ قَالَ مُوسٰى لِقَوْمِه۪ يَا قَوْمِ لِمَ تُؤْذُونَن۪ي وَقَدْ تَعْلَمُونَ اَنّ۪ي رَسُولُ اللّٰهِ اِلَيْكُمْۜ فَلَمَّا زَاغُٓوا اَزَاغَ اللّٰهُ قُلُوبَهُمْۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِق۪ينَ5
और याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! तुम मुझे क्यो दुख देते हो, हालाँकि तुम जानते हो कि मैं तुम्हारी ओर भेजा हुआ अल्लाह का रसूल हूँ?" फिर जब उन्होंने टेढ़ अपनाई तो अल्लाह ने भी उनके दिल टेढ़ कर दिए। अल्लाह अवज्ञाकारियों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता