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558. पृष्ठ
65 · अत-तलाक
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ اِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَٓاءَ فَطَلِّقُوهُنَّ لِعِدَّتِهِنَّ وَاَحْصُوا الْعِدَّةَۚ وَاتَّقُوا اللّٰهَ رَبَّكُمْۚ لَا تُخْرِجُوهُنَّ مِنْ بُيُوتِهِنَّ وَلَا يَخْرُجْنَ اِلَّٓا اَنْ يَاْت۪ينَ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍۜ وَتِلْكَ حُدُودُ اللّٰهِۜ وَمَنْ يَتَعَدَّ حُدُودَ اللّٰهِ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهُۜ لَا تَدْر۪ي لَعَلَّ اللّٰهَ يُحْدِثُ بَعْدَ ذٰلِكَ اَمْرًا1
ऐ नबी! जब तुम लोग स्त्रियों को तलाक़ दो तो उन्हें तलाक़ उनकी इद्दत के हिसाब से दो। और इद्दत की गणना करो और अल्लाह का डर रखो, जो तुम्हारा रब है। उन्हें उनके घरों से न निकालो और न वे स्वयं निकलें, सिवाय इसके कि वे कोई स्पष्ट। अशोभनीय कर्म कर बैठें। ये अल्लाह की नियत की हुई सीमाएँ है - और जो अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करे तो उसने स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया - तुम नहीं जानते, कदाचित इस (तलाक़) के पश्चात अल्लाह कोई सूरत पैदा कर दे
فَاِذَا بَلَغْنَ اَجَلَهُنَّ فَاَمْسِكُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ اَوْ فَارِقُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ وَاَشْهِدُوا ذَوَيْ عَدْلٍ مِنْكُمْ وَاَق۪يمُوا الشَّهَادَةَ لِلّٰهِۜ ذٰلِكُمْ يُوعَظُ بِه۪ مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِۜ وَمَنْ يَتَّقِ اللّٰهَ يَجْعَلْ لَهُ مَخْرَجًاۙ2
फिर जब वे अपनी नियत इद्दत को पहुँचे तो या तो उन्हें भली रीति से रोक लो या भली रीति से अलग कर दो। और अपने में से दो न्यायप्रिय आदमियों को गवाह बना दो और अल्लाह के लिए गवाही को दुरुस्त रखो। इसकी नसीहत उस व्यक्ति को की जाती है जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखेगा उसके लिए वह (परेशानी से) निकलने का राह पैदा कर देगा
وَيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُۜ وَمَنْ يَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِ فَهُوَ حَسْبُهُۜ اِنَّ اللّٰهَ بَالِغُ اَمْرِه۪ۜ قَدْ جَعَلَ اللّٰهُ لِكُلِّ شَيْءٍ قَدْرًا3
और उसे वहाँ से रोज़ी देगा जिसका उसे गुमान भी न होगा। जो अल्लाह पर भरोसा करे तो वह उसके लिए काफ़ी है। निश्चय ही अल्लाह अपना काम पूरा करके रहता है। अल्लाह ने हर चीज़ का एक अन्दाजा नियत कर रखा है
وَالّٰٓـ۪ٔي يَئِسْنَ مِنَ الْمَح۪يضِ مِنْ نِسَٓائِكُمْ اِنِ ارْتَبْتُمْ فَعِدَّتُهُنَّ ثَلٰثَةُ اَشْهُرٍۙ وَالّٰٓـ۪ٔي لَمْ يَحِضْنَۜ وَاُو۬لَاتُ الْاَحْمَالِ اَجَلُهُنَّ اَنْ يَضَعْنَ حَمْلَهُنَّۜ وَمَنْ يَتَّقِ اللّٰهَ يَجْعَلْ لَهُ مِنْ اَمْرِه۪ يُسْرًا4
और तुम्हारी स्त्रियों में से जो मासिक धर्म से निराश हो चुकी हों, यदि तुम्हें संदेह हो तो उनकी इद्दत तीन मास है और इसी प्रकार उनकी भी जो अभी रजस्वला नहीं हुई। और जो गर्भवती स्त्रियाँ हो उनकी इद्दत उनके शिशु-प्रसव तक है। जो कोई अल्लाह का डर रखेगा उसके मामले में वह आसानी पैदा कर देगा
ذٰلِكَ اَمْرُ اللّٰهِ اَنْزَلَهُٓ اِلَيْكُمْۜ وَمَنْ يَتَّقِ اللّٰهَ يُكَفِّرْ عَنْهُ سَيِّـَٔاتِه۪ وَيُعْظِمْ لَهُٓ اَجْرًا5
यह अल्लाह का आदेश है जो उसने तुम्हारी ओर उतारा है। और जो कोई अल्लाह का डर रखेगा उससे वह उसकी बुराईयाँ दूर कर देगा और उसके प्रतिदान को बड़ा कर देगा