562. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
67 · अल-मुल्क
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
تَبَارَكَ الَّذ۪ي بِيَدِهِ الْمُلْكُۘ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌۙ1
बड़ा बरकतवाला है वह जिसके हाथ में सारी बादशाही है और वह हर चीज़ की सामर्थ्य रखता है। -
اَلَّذ۪ي خَلَقَ الْمَوْتَ وَالْحَيٰوةَ لِيَبْلُوَكُمْ اَيُّكُمْ اَحْسَنُ عَمَلًاۜ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْغَفُورُۙ2
जिसने पैदा किया मृत्यु और जीवन को, ताकि तुम्हारी परीक्षा करे कि तुममें कर्म की दृष्टि से कौन सबसे अच्छा है। वह प्रभुत्वशाली, बड़ा क्षमाशील है। -
اَلَّذ۪ي خَلَقَ سَبْعَ سَمٰوَاتٍ طِبَاقًاۜ مَا تَرٰى ف۪ي خَلْقِ الرَّحْمٰنِ مِنْ تَفَاوُتٍۜ فَارْجِعِ الْبَصَرَۙ هَلْ تَرٰى مِنْ فُطُورٍ3
जिसने ऊपर-तले सात आकाश बनाए। तुम रहमान की रचना में कोई असंगति और विषमता न देखोगे। फिर नज़र डालो, "क्या तुम्हें कोई बिगाड़ दिखाई देता है?"
ثُمَّ ارْجِعِ الْبَصَرَ كَرَّتَيْنِ يَنْقَلِبْ اِلَيْكَ الْبَصَرُ خَاسِئًا وَهُوَ حَس۪يرٌ4
फिर दोबारा नज़र डालो। निगाह रद्द होकर और थक-हारकर तुम्हारी ओर पलट आएगी
وَلَقَدْ زَيَّنَّا السَّمَٓاءَ الدُّنْيَا بِمَصَاب۪يحَ وَجَعَلْنَاهَا رُجُومًا لِلشَّيَاط۪ينِ وَاَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابَ السَّع۪يرِ5
हमने निकटवर्ती आकाश को दीपों से सजाया और उन्हें शैतानों के मार भगाने का साधन बनाया और उनके लिए हमने भड़कती आग की यातना तैयार कर रखी है
وَلِلَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِرَبِّهِمْ عَذَابُ جَهَنَّمَۜ وَبِئْسَ الْمَص۪يرُ6
जिन लोगों ने अपने रब के साथ कुफ़्र किया उनके लिए जहन्नम की यातना है और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है
اِذَٓا اُلْقُوا ف۪يهَا سَمِعُوا لَهَا شَه۪يقًا وَهِيَ تَفُورُۙ7
जब वे उसमें डाले जाएँगे तो उसकी दहाड़ने की भयानक आवाज़ सुनेंगे और वह प्रकोप से बिफर रही होगी।
تَكَادُ تَمَيَّزُ مِنَ الْغَيْظِۜ كُلَّمَٓا اُلْقِيَ ف۪يهَا فَوْجٌ سَاَلَهُمْ خَزَنَتُهَٓا اَلَمْ يَاْتِكُمْ نَذ۪يرٌ8
ऐसा प्रतीत होगा कि प्रकोप के कारण अभी फट पड़ेगी। हर बार जब भी कोई समूह उसमें डाला जाएगा तो उसके कार्यकर्ता उनसे पूछेंगे, "क्या तुम्हारे पास कोई सावधान करनेवाला नहीं आया?"
قَالُوا بَلٰى قَدْ جَٓاءَنَا نَذ۪يرٌ فَكَذَّبْنَا وَقُلْنَا مَا نَزَّلَ اللّٰهُ مِنْ شَيْءٍۚ اِنْ اَنْتُمْ اِلَّا ف۪ي ضَلَالٍ كَب۪يرٍ9
वे कहेंगे, "क्यों नहीं, अवश्य हमारे पास आया था, किन्तु हमने झुठला दिया और कहा कि अल्लाह ने कुछ भी नहीं अवतरित किया। तुम तो बस एक बड़ी गुमराही में पड़े हुए हो।"
وَقَالُوا لَوْ كُنَّا نَسْمَعُ اَوْ نَعْقِلُ مَا كُنَّا ف۪ٓي اَصْحَابِ السَّع۪يرِ10
और वे कहेंगे, "यदि हम सुनते या बुद्धि से काम लेते तो हम दहकती आग में पड़नेवालों में सम्मिलित न होते।"
فَاعْتَرَفُوا بِذَنْبِهِمْۚ فَسُحْقًا لِاَصْحَابِ السَّع۪يرِ11
इस प्रकार वे अपने गुनाहों को स्वीकार करेंगे, तो धिक्कार हो दहकती आगवालों पर!
اِنَّ الَّذ۪ينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ بِالْغَيْبِ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَاَجْرٌ كَب۪يرٌ12
जो लोग परोक्ष में रहते हुए अपने रब से डरते है, उनके लिए क्षमा और बड़ा बदला है