570. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
70 · अल-मआरिज71 · नूह
فَلَٓا اُقْسِمُ بِرَبِّ الْمَشَارِقِ وَالْمَغَارِبِ اِنَّا لَقَادِرُونَۙ40
अतः कुछ नहीं, मैं क़सम खाता हूँ पूर्वों और पश्चिमों के रब की, हमे इसकी सामर्थ्य प्राप्त है
عَلٰٓى اَنْ نُبَدِّلَ خَيْرًا مِنْهُمْۙ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوق۪ينَ41
कि उनकी उनसे अच्छे ले आएँ और हम पिछड़ जानेवाले नहीं है
فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا وَيَلْعَبُوا حَتّٰى يُلَاقُوا يَوْمَهُمُ الَّذ۪ي يُوعَدُونَۙ42
अतः उन्हें छोड़ो कि वे व्यर्थ बातों में पड़े रहें और खेलते रहे, यहाँ तक कि वे अपने उस दिन से मिलें, जिसका उनसे वादा किया जा रहा है,
يَوْمَ يَخْرُجُونَ مِنَ الْاَجْدَاثِ سِرَاعًا كَاَنَّهُمْ اِلٰى نُصُبٍ يُوفِضُونَۙ43
जिस दिन वे क़ब्रों से तेज़ी के साथ निकलेंगे जैसे किसी निशान की ओर दौड़े जा रहे है,
خَاشِعَةً اَبْصَارُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌۜ ذٰلِكَ الْيَوْمُ الَّذ۪ي كَانُوا يُوعَدُونَ44
उनकी निगाहें झुकी होंगी, ज़िल्लत उनपर छा रही होगी। यह है वह दिन जिससे वह डराए जाते रहे है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِنَّٓا اَرْسَلْنَا نُوحًا اِلٰى قَوْمِه۪ٓ اَنْ اَنْذِرْ قَوْمَكَ مِنْ قَبْلِ اَنْ يَاْتِيَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ1
हमने नूह को उसकी कौ़म की ओर भेजा कि "अपनी क़ौम के लोगों को सावधान कर दो, इससे पहले कि उनपर कोई दुखद यातना आ जाए।"
قَالَ يَا قَوْمِ اِنّ۪ي لَكُمْ نَذ۪يرٌ مُب۪ينٌۙ2
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं तुम्हारे लिए एक स्पष्ट सचेतकर्ता हूँ
اَنِ اعْبُدُوا اللّٰهَ وَاتَّقُوهُ وَاَط۪يعُونِۙ3
कि अल्लाह की बन्दगी करो और उसका डर रखो और मेरी आज्ञा मानो।-
يَغْفِرْ لَكُمْ مِنْ ذُنُوبِكُمْ وَيُؤَخِّرْكُمْ اِلٰٓى اَجَلٍ مُسَمًّىۜ اِنَّ اَجَلَ اللّٰهِ اِذَا جَٓاءَ لَا يُؤَخَّرُۢ لَوْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ4
"वह तुम्हें क्षमा करके तुम्हारे गुनाहों से तुम्हें पाक कर देगा और एक निश्चित समय तक तुम्हे मुहल्लत देगा। निश्चय ही जब अल्लाह का निश्चित समय आ जाता है तो वह टलता नहीं, काश कि तुम जानते!"
قَالَ رَبِّ اِنّ۪ي دَعَوْتُ قَوْم۪ي لَيْلًا وَنَهَارًاۙ5
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मैंने अपनी क़ौम के लोगों को रात और दिन बुलाया
فَلَمْ يَزِدْهُمْ دُعَٓاء۪ٓي اِلَّا فِرَارًا6
"किन्तु मेरी पुकार ने उनके पलायन को ही बढ़ाया
وَاِنّ۪ي كُلَّمَا دَعَوْتُهُمْ لِتَغْفِرَ لَهُمْ جَعَلُٓوا اَصَابِعَهُمْ ف۪ٓي اٰذَانِهِمْ وَاسْتَغْشَوْا ثِيَابَهُمْ وَاَصَرُّوا وَاسْتَكْبَرُوا اسْتِكْبَارًاۚ7
"और जब भी मैंने उन्हें बुलाया, ताकि तू उन्हें क्षमा कर दे, तो उन्होंने अपने कानों में अपनी उँगलियाँ दे लीं और अपने कपड़ो से स्वयं को ढाँक लिया और अपनी हठ पर अड़ गए और बड़ा ही घमंड किया
ثُمَّ اِنّ۪ي دَعَوْتُهُمْ جِهَارًاۙ8
"फिर मैंने उन्हें खुल्लमखुल्ला बुलाया,
ثُمَّ اِنّ۪ٓي اَعْلَنْتُ لَهُمْ وَاَسْرَرْتُ لَهُمْ اِسْرَارًاۙ9
"फिर मैंने उनसे खुले तौर पर भी बातें की और उनसे चुपके-चुपके भी बातें की
فَقُلْتُ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ اِنَّهُ كَانَ غَفَّارًاۙ10
"और मैंने कहा, अपने रब से क्षमा की प्रार्थना करो। निश्चय ही वह बड़ा क्षमाशील है,