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581. पृष्ठ
77 · अल-मुरसालात
اَلَمْ نَخْلُقْكُمْ مِنْ مَٓاءٍ مَه۪ينٍۙ20
क्या ऐस नहीं है कि हमने तुम्हे तुच्छ जल से पैदा किया,
فَجَعَلْنَاهُ ف۪ي قَرَارٍ مَك۪ينٍۙ21
फिर हमने उसे एक सुरक्षित टिकने की जगह रखा,
اِلٰى قَدَرٍ مَعْلُومٍۙ22
एक ज्ञात और निश्चित अवधि तक?
فَقَدَرْنَاۗ فَنِعْمَ الْقَادِرُونَ23
फिर हमने अन्दाजा ठहराया, तो हम क्या ही अच्छा अन्दाज़ा ठहरानेवाले है
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ24
तबाही है उस दिन झूठलानेवालों की!
اَلَمْ نَجْعَلِ الْاَرْضَ كِفَاتًاۙ25
क्या ऐसा नहीं है कि हमने धरती को समेट रखनेवाली बनाया,
اَحْيَٓاءً وَاَمْوَاتًاۙ26
ज़िन्दों को भी और मुर्दों को भी,
وَجَعَلْنَا ف۪يهَا رَوَاسِيَ شَامِخَاتٍ وَاَسْقَيْنَاكُمْ مَٓاءً فُرَاتًاۜ27
और उसमें ऊँचे-ऊँचे पहाड़ जमाए और तुम्हें मीठा पानी पिलाया?
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ28
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
اِنْطَلِقُٓوا اِلٰى مَا كُنْتُمْ بِه۪ تُكَذِّبُونَۚ29
चलो उस चीज़ की ओर जिसे तुम झुठलाते रहे हो!
اِنْطَلِقُٓوا اِلٰى ظِلٍّ ذ۪ي ثَلٰثِ شُعَبٍۙ30
चलो तीन शाखाओंवाली छाया की ओर,
لَا ظَل۪يلٍ وَلَا يُغْن۪ي مِنَ اللَّهَبِۜ31
जिसमें न छाँव है और न वह अग्नि-ज्वाला से बचा सकती है
اِنَّهَا تَرْم۪ي بِشَرَرٍ كَالْقَصْرِۚ32
निस्संदेह वे (ज्वालाएँ) महल जैसी (ऊँची) चिंगारियाँ फेंकती है
كَاَنَّهُ جِمَالَتٌ صُفْرٌۜ33
मानो वे पीले ऊँट हैं!
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ34
तबाही है उस झुठलानेवालों की!
هٰذَا يَوْمُ لَا يَنْطِقُونَۙ35
यह वह दिन है कि वे कुछ बोल नहीं रहे है,
وَلَا يُؤْذَنُ لَهُمْ فَيَعْتَذِرُونَ36
तो कोई उज़ पेश करें, (बात यह है कि) उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी जा रही है
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ37
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की
هٰذَا يَوْمُ الْفَصْلِۚ جَمَعْنَاكُمْ وَالْاَوَّل۪ينَ38
"यह फ़ैसले का दिन है, हमने तुम्हें भी और पहलों को भी इकट्ठा कर दिया
فَاِنْ كَانَ لَكُمْ كَيْدٌ فَك۪يدُونِ39
"अब यदि तुम्हारे पास कोई चाल है तो मेरे विरुद्ध चलो।"
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ۟40
तबाही है उस दिन झुठलानेवालो की!
اِنَّ الْمُتَّق۪ينَ ف۪ي ظِلَالٍ وَعُيُونٍۙ41
निस्संदेह डर रखनेवाले छाँवों और स्रोतों में है,
وَفَوَاكِهَ مِمَّا يَشْتَهُونَۜ42
और उन फलों के बीच जो वे चाहे
كُلُوا وَاشْرَبُوا هَن۪ٓيـًٔا بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ43
"खाओ-पियो मज़े से, उस कर्मों के बदले में जो तुम करते रहे हो।"
اِنَّا كَذٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِن۪ينَ44
निश्चय ही उत्तमकारों को हम ऐसा ही बदला देते है
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ45
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
كُلُوا وَتَمَتَّعُوا قَل۪يلًا اِنَّكُمْ مُجْرِمُونَ46
"खा लो और मज़े कर लो थोड़ा-सा, वास्तव में तुम अपराधी हो!"
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ47
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمُ ارْكَعُوا لَا يَرْكَعُونَ48
जब उनसे कहा जाता है कि "झुको! तो नहीं झुकते।"
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ49
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
فَبِاَيِّ حَد۪يثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ50
अब आख़िर इसके पश्चात किस वाणी पर वे ईमान लाएँगे?