594. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

594. पृष्ठ
89 · अल-फ़जर
يَقُولُ يَا لَيْتَن۪ي قَدَّمْتُ لِحَيَات۪يۚ24
वह कहेगा, "ऐ काश! मैंने अपने जीवन के लिए कुछ करके आगे भेजा होता।"
فَيَوْمَئِذٍ لَا يُعَذِّبُ عَذَابَهُٓ اَحَدٌۙ25
फिर उस दिन कोई नहीं जो उसकी जैसी यातना दे,
وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُٓ اَحَدٌۜ26
और कोई नहीं जो उसकी जकड़बन्द की तरह बाँधे
يَٓا اَيَّتُهَا النَّفْسُ الْمُطْمَئِنَّةُۗ27
"ऐ संतुष्ट आत्मा!
اِرْجِع۪ٓي اِلٰى رَبِّكِ رَاضِيَةً مَرْضِيَّةًۚ28
लौट अपने रब की ओर, इस तरह कि तू उससे राज़ी है वह तुझसे राज़ी है। अतः मेरे बन्दों में सम्मिलित हो जा। -
فَادْخُل۪ي ف۪ي عِبَاد۪يۙ29
अतः मेरे बन्दों में सम्मिलित हो जा
وَادْخُل۪ي جَنَّت۪ي30
और प्रवेश कर मेरी जन्नत में।"
90 · अल-बलद
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
لَٓا اُقْسِمُ بِهٰذَا الْبَلَدِۙ1
सुनो! मैं क़सम खाता हूँ इस नगर (मक्का) की -
وَاَنْتَ حِلٌّ بِهٰذَا الْبَلَدِۙ2
हाल यह है कि तुम इसी नगर में रह रहे हो -
وَوَالِدٍ وَمَا وَلَدَۙ3
और बाप और उसकी सन्तान की,
لَقَدْ خَلَقْنَا الْاِنْسَانَ ف۪ي كَبَدٍۜ4
निस्संदेह हमने मनुष्य को पूर्ण मशक़्क़त (अनुकूलता और सन्तुलन) के साथ पैदा किया
اَيَحْسَبُ اَنْ لَنْ يَقْدِرَ عَلَيْهِ اَحَدٌۢ5
क्या वह समझता है कि उसपर किसी का बस न चलेगा?
يَقُولُ اَهْلَكْتُ مَالًا لُبَدًاۜ6
कहता है कि "मैंने ढेरो माल उड़ा दिया।"
اَيَحْسَبُ اَنْ لَمْ يَرَهُٓ اَحَدٌۜ7
क्या वह समझता है कि किसी ने उसे देखा नहीं?
اَلَمْ نَجْعَلْ لَهُ عَيْنَيْنِۙ8
क्या हमने उसे नहीं दी दो आँखें,
وَلِسَانًا وَشَفَتَيْنِۙ9
और एक ज़बान और दो होंठ?
وَهَدَيْنَاهُ النَّجْدَيْنِۚ10
और क्या ऐसा नहीं है कि हमने दिखाई उसे दो ऊँचाइयाँ?
فَلَا اقْتَحَمَ الْعَقَبَةَۘ11
किन्तु वह तो हुमककर घाटी में से गुजंरा ही नहीं और (न उसने मुक्ति का मार्ग पाया)
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا الْعَقَبَةُۜ12
और तुम्हें क्या मालूम कि वह घाटी क्या है!
فَكُّ رَقَبَةٍۙ13
किसी गरदन का छुड़ाना
اَوْ اِطْعَامٌ ف۪ي يَوْمٍ ذ۪ي مَسْغَبَةٍۙ14
या भूख के दिन खाना खिलाना
يَت۪يمًا ذَا مَقْرَبَةٍۙ15
किसी निकटवर्ती अनाथ को,
اَوْ مِسْك۪ينًا ذَا مَتْرَبَةٍۜ16
या धूल-धूसरित मुहताज को;
ثُمَّ كَانَ مِنَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا بِالْمَرْحَمَةِۜ17
फिर यह कि वह उन लोगों में से हो जो ईमान लाए और जिन्होंने एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की , और एक-दूसरे को दया की ताकीद की
اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ الْمَيْمَنَةِۜ18
वही लोग है सौभाग्यशाली
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِاٰيَاتِنَا هُمْ اَصْحَابُ الْمَشْـَٔمَةِۜ19
रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयातों का इनकार किया, वे दुर्भाग्यशाली लोग है
عَلَيْهِمْ نَارٌ مُؤْصَدَةٌ20
उनपर आग होगी, जिसे बन्द कर दिया गया होगा