61. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
3 · आले-इमरान
قُلْ اٰمَنَّا بِاللّٰهِ وَمَٓا اُنْزِلَ عَلَيْنَا وَمَٓا اُنْزِلَ عَلٰٓى اِبْرٰه۪يمَ وَاِسْمٰع۪يلَ وَاِسْحٰقَ وَيَعْقُوبَ وَالْاَسْبَاطِ وَمَٓا اُو۫تِيَ مُوسٰى وَع۪يسٰى وَالنَّبِيُّونَ مِنْ رَبِّهِمْۖ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ اَحَدٍ مِنْهُمْۘ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ84
कहो, "हम तो अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान लाए जो हम पर उतरी है, और जो इबराहीम, इसमाईल, इसहाक़ और याकूब़ और उनकी सन्तान पर उतरी उसपर भी, और जो मूसा और ईसा और दूसरे नबियो को उनके रब की ओर से प्रदान हुई (उसपर भी हम ईमान रखते है) । हम उनमें से किसी को उस ओर से प्रदान हुई (उसपर भी हम ईमान रखते है) । हम उनमें से किसी को उस सम्बन्ध से अलग नहीं करते जो उनके बीच पाया जाता है, और हम उसी के आज्ञाकारी (मुस्लिम) है।"
وَمَنْ يَبْتَغِ غَيْرَ الْاِسْلَامِ د۪ينًا فَلَنْ يُقْبَلَ مِنْهُۚ وَهُوَ فِي الْاٰخِرَةِ مِنَ الْخَاسِر۪ينَ85
जो इस्लाम के अतिरिक्त कोई और दीन (धर्म) तलब करेगा तो उसकी ओर से कुछ भी स्वीकार न किया जाएगा। और आख़िरत में वह घाटा उठानेवालों में से होगा
كَيْفَ يَهْدِي اللّٰهُ قَوْمًا كَفَرُوا بَعْدَ ا۪يمَانِهِمْ وَشَهِدُٓوا اَنَّ الرَّسُولَ حَقٌّ وَجَٓاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِم۪ينَ86
अल्लाह उन लोगों को कैसे मार्ग दिखाएगा, जिन्होंने अपने ईमान के पश्चात अधर्म और इनकार की नीति अपनाई, जबकि वे स्वयं इस बात की गवाही दे चुके हैं कि यह रसूल सच्चा है और उनके पास स्पष्ट निशानियाँ भी आ चुकी हैं? अल्लाह अत्याचारी लोगों को मार्ग नहीं दिखाया करता
اُو۬لٰٓئِكَ جَزَٓاؤُ۬هُمْ اَنَّ عَلَيْهِمْ لَعْنَةَ اللّٰهِ وَالْمَلٰٓئِكَةِ وَالنَّاسِ اَجْمَع۪ينَۙ87
उन लोगों का बदला यही है कि उनपर अल्लाह और फ़रिश्तों और सारे मनुष्यों की लानत है
خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۚ لَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنْظَرُونَۙ88
इसी दशा में वे सदैव रहेंगे, न उनकी यातना हल्की होगी और न उन्हें मुहलत ही दी जाएगी
اِلَّا الَّذ۪ينَ تَابُوا مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَ وَاَصْلَحُوا فَاِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ89
हाँ, जिन लोगों ने इसके पश्चात तौबा कर ली और अपनी नीति को सुधार लिया तो निस्संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
اِنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بَعْدَ ا۪يمَانِهِمْ ثُمَّ ازْدَادُوا كُفْرًا لَنْ تُقْبَلَ تَوْبَتُهُمْۚ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الضَّٓالُّونَ90
रहे वे लोग जिन्होंने अपने ईमान के पश्चात इनकार किया और अपने इनकार में बढ़ते ही गए, उनकी तौबा कदापि स्वीकार न होगी। वास्तव में वही पथभ्रष्ट हैं
اِنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَمَاتُوا وَهُمْ كُفَّارٌ فَلَنْ يُقْبَلَ مِنْ اَحَدِهِمْ مِلْءُ الْاَرْضِ ذَهَبًا وَلَوِ افْتَدٰى بِه۪ۜ اُو۬لٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ وَمَا لَهُمْ مِنْ نَاصِر۪ينَ۟91
निस्संदेह जिन लोगों ने इनकार किया और इनकार ही की दशा में मरे, तो उनमें किसी से धरती के बराबर सोना भी, यदि उसने प्राण-मुक्ति के लिए दिया हो, कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा। ऐसे लोगों के लिए दुखद यातना है और उनका कोई सहायक न होगा