62. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
3 · आले-इमरान
لَنْ تَنَالُوا الْبِرَّ حَتّٰى تُنْفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَۜ وَمَا تُنْفِقُوا مِنْ شَيْءٍ فَاِنَّ اللّٰهَ بِه۪ عَل۪يمٌ92
तुम नेकी और वफ़ादारी के दर्जे को नहीं पहुँच सकते, जब तक कि उन चीज़ो को (अल्लाह के मार्ग में) ख़र्च न करो, जो तुम्हें प्रिय है। और जो चीज़ भी तुम ख़र्च करोगे, निश्चय ही अल्लाह को उसका ज्ञान होगा
كُلُّ الطَّعَامِ كَانَ حِلًّا لِبَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ اِلَّا مَا حَرَّمَ اِسْرَٓاء۪يلُ عَلٰى نَفْسِه۪ مِنْ قَبْلِ اَنْ تُنَزَّلَ التَّوْرٰيةُۜ قُلْ فَاْتُوا بِالتَّوْرٰيةِ فَاتْلُوهَٓا اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ93
खाने की सारी चीज़े इसराईल की संतान के लिए हलाल थी, सिवाय उन चीज़ों के जिन्हें तौरात के उतरने से पहले इसराईल ने स्वयं अपने हराम कर लिया था। कहो, "यदि तुम सच्चे हो तो तौरात लाओ और उसे पढ़ो।"
فَمَنِ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ الْكَذِبَ مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ94
अब इसके पश्चात भी जो व्यक्ति झूठी बातें अल्लाह से जोड़े, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी है
قُلْ صَدَقَ اللّٰهُ فَاتَّبِعُوا مِلَّةَ اِبْرٰه۪يمَ حَن۪يفًاۜ وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَ95
कहो, "अल्लाह ने सच कहा है; अतः इबराहीम के तरीक़े का अनुसरण करो, जो हर ओर से कटकर एक का हो गया था और मुशरिकों में से न था
اِنَّ اَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذ۪ي بِبَكَّةَ مُبَارَكًا وَهُدًى لِلْعَالَم۪ينَۚ96
"निस्ंसदेह इबादत के लिए पहला घर जो 'मानव के लिए' बनाया गया वहीं है जो मक्का में है, बरकतवाला और सर्वथा मार्गदर्शन, संसारवालों के लिए
ف۪يهِ اٰيَاتٌ بَيِّنَاتٌ مَقَامُ اِبْرٰه۪يمَۚ وَمَنْ دَخَلَهُ كَانَ اٰمِنًاۜ وَلِلّٰهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ اِلَيْهِ سَب۪يلًاۜ وَمَنْ كَفَرَ فَاِنَّ اللّٰهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَم۪ينَ97
"उसमें स्पष्ट निशानियाँ है, वह इबराहीम का स्थल है। और जिसने उसमें प्रवेश किया, वह निश्चिन्त हो गया। लोगों पर अल्लाह का हक़ है कि जिसको वहाँ तक पहुँचने की सामर्थ्य प्राप्त हो, वह इस घर का हज करे, और जिसने इनकार किया तो (इस इनकार से अल्लाह का कुछ नहीं बिगड़ता) अल्लाह तो सारे संसार से निरपेक्ष है।"
قُلْ يَٓا اَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِاٰيَاتِ اللّٰهِۗ وَاللّٰهُ شَه۪يدٌ عَلٰى مَا تَعْمَلُونَ98
कहो, "ऐ किताबवालों! तुम अल्लाह की आयतों का इनकार क्यों करते हो, जबकि जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह की दृष्टिअ में है?"
قُلْ يَٓا اَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَصُدُّونَ عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِ مَنْ اٰمَنَ تَبْغُونَهَا عِوَجًا وَاَنْتُمْ شُهَدَٓاءُۜ وَمَا اللّٰهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ99
कहो, "ऐ किताबवालो! तुम ईमान लानेवालों को अल्लाह के मार्ग से क्यो रोकते हो, तुम्हें उसमें किसी टेढ़ की तलाश रहती है, जबकि तुम भली-भाँति वास्तविकता से अवगत हो और जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है।"
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنْ تُط۪يعُوا فَر۪يقًا مِنَ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْكِتَابَ يَرُدُّوكُمْ بَعْدَ ا۪يمَانِكُمْ كَافِر۪ينَ100
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुमने उनके किसी गिरोह की बात माल ली, जिन्हें किताब मिली थी, तो वे तुम्हारे ईमान लाने के पश्चात फिर तुम्हें अधर्मी बना देंगे