66. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
3 · आले-इमरान
اِذْ هَمَّتْ طَٓائِفَتَانِ مِنْكُمْ اَنْ تَفْشَلَاۙ وَاللّٰهُ وَلِيُّهُمَاۜ وَعَلَى اللّٰهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ122
जब तुम्हारे दो गिरोहों ने साहस छोड़ देना चाहा, जबकि अल्लाह उनका संरक्षक मौजूद था - और ईमानवालों को तो अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए
وَلَقَدْ نَصَرَكُمُ اللّٰهُ بِبَدْرٍ وَاَنْتُمْ اَذِلَّةٌۚ فَاتَّقُوا اللّٰهَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ123
और बद्र में अल्लाह तुम्हारी सहायता कर भी चुका था, जबकि तुम बहुत कमज़ोर हालत में थे। अतः अल्लाह ही का डर रखो, ताकि तुम कृतज्ञ बनो
اِذْ تَقُولُ لِلْمُؤْمِن۪ينَ اَلَنْ يَكْفِيَكُمْ اَنْ يُمِدَّكُمْ رَبُّكُمْ بِثَلٰثَةِ اٰلَافٍ مِنَ الْمَلٰٓئِكَةِ مُنْزَل۪ينَۜ124
जब तुम ईमानवालों से कह रहे थे, "क्या यह तुम्हारे लिए काफ़ी नही हैं कि तुम्हारा रब तीन हज़ार फ़रिश्ते उतारकर तुम्हारी सहायता करे?"
بَلٰٓىۙ اِنْ تَصْبِرُوا وَتَتَّقُوا وَيَاْتُوكُمْ مِنْ فَوْرِهِمْ هٰذَا يُمْدِدْكُمْ رَبُّكُمْ بِخَمْسَةِ اٰلَافٍ مِنَ الْمَلٰٓئِكَةِ مُسَوِّم۪ينَ125
हाँ, क्यों नहीं। यदि तुम धैर्य से काम लो और डर रखो, फिर शत्रु सहसा तुमपर चढ़ आएँ, उसी क्षण तुम्हारा रब पाँच हज़ार विध्वंशकारी फ़रिश्तों से तुम्हारी सहायता करेगा
وَمَا جَعَلَهُ اللّٰهُ اِلَّا بُشْرٰى لَكُمْ وَلِتَطْمَئِنَّ قُلُوبُكُمْ بِه۪ۜ وَمَا النَّصْرُ اِلَّا مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ الْعَز۪يزِ الْحَك۪يمِۙ126
अल्लाह ने तो इसे तुम्हारे लिए बस एक शुभ-सूचना बनाया और इसलिए कि तुम्हारे दिल सन्तुष्ट हो जाएँ - सहायता तो बस अल्लाह ही के यहाँ से आती है जो अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
لِيَقْطَعَ طَرَفًا مِنَ الَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اَوْ يَكْبِتَهُمْ فَيَنْقَلِبُوا خَٓائِب۪ينَ127
ताकि इनकार करनेवालों के एक हिस्से को काट डाले या उन्हें बुरी पराजित और अपमानित कर दे कि वे असफल होकर लौटें
لَيْسَ لَكَ مِنَ الْاَمْرِ شَيْءٌ اَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ اَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَاِنَّهُمْ ظَالِمُونَ128
तुम्हें इस मामले में कोई अधिकार नहीं - चाहे वह उसकी तौबा क़बूल करे या उन्हें यातना दे, क्योंकि वे अत्याचारी है
وَلِلّٰهِ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۜ يَغْفِرُ لِمَنْ يَشَٓاءُ وَيُعَذِّبُ مَنْ يَشَٓاءُۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ۟129
आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, अल्लाह ही का है। वह जिसे चाहे क्षमा कर दे और जिसे चाहे यातना दे। और अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَاْكُلُوا الرِّبٰٓوا اَضْعَافًا مُضَاعَفَةًۖ وَاتَّقُوا اللّٰهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَۚ130
ऐ ईमान लानेवालो! बढ़ोत्तरी के ध्येय से ब्याज न खाओ, जो कई गुना अधिक हो सकता है। और अल्लाह का डर रखो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो
وَاتَّقُوا النَّارَ الَّت۪ٓي اُعِدَّتْ لِلْكَافِر۪ينَۚ131
और उस आग से बचो जो इनकार करनेवालों के लिए तैयार है
وَاَط۪يعُوا اللّٰهَ وَالرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَۚ132
और अल्लाह और रसूल के आज्ञाकारी बनो, ताकि तुमपर दया की जाए