67. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
3 · आले-इमरान
وَسَارِعُٓوا اِلٰى مَغْفِرَةٍ مِنْ رَبِّكُمْ وَجَنَّةٍ عَرْضُهَا السَّمٰوَاتُ وَالْاَرْضُۙ اُعِدَّتْ لِلْمُتَّق۪ينَۙ133
और अपने रब की क्षमा और उस जन्नत की ओर बढ़ो, जिसका विस्तार आकाशों और धरती जैसा है। वह उन लोगों के लिए तैयार है जो डर रखते है
اَلَّذ۪ينَ يُنْفِقُونَ فِي السَّرَّٓاءِ وَالضَّرَّٓاءِ وَالْكَاظِم۪ينَ الْغَيْظَ وَالْعَاف۪ينَ عَنِ النَّاسِۜ وَاللّٰهُ يُحِبُّ الْمُحْسِن۪ينَۚ134
वे लोग जो ख़ुशहाली और तंगी की प्रत्येक अवस्था में ख़र्च करते रहते है और क्रोध को रोकते है और लोगों को क्षमा करते है - और अल्लाह को भी ऐसे लोग प्रिय है, जो अच्छे से अच्छा कर्म करते है
وَالَّذ۪ينَ اِذَا فَعَلُوا فَاحِشَةً اَوْ ظَلَمُٓوا اَنْفُسَهُمْ ذَكَرُوا اللّٰهَ فَاسْتَغْفَرُوا لِذُنُوبِهِمْۚ وَمَنْ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ اِلَّا اللّٰهُۖ وَلَمْ يُصِرُّوا عَلٰى مَا فَعَلُوا وَهُمْ يَعْلَمُونَ135
और जिनका हाल यह है कि जब वे कोई खुला गुनाह कर बैठते है या अपने आप पर ज़ुल्म करते है तौ तत्काल अल्लाह उन्हें याद आ जाता है और वे अपने गुनाहों की क्षमा चाहने लगते हैं - और अल्लाह के अतिरिक्त कौन है, जो गुनाहों को क्षमा कर सके? और जानते-बूझते वे अपने किए पर अड़े नहीं रहते
اُو۬لٰٓئِكَ جَزَٓاؤُ۬هُمْ مَغْفِرَةٌ مِنْ رَبِّهِمْ وَجَنَّاتٌ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۜ وَنِعْمَ اَجْرُ الْعَامِل۪ينَۜ136
उनका बदला उनके रब की ओर से क्षमादान है और ऐसे बाग़ है जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। उनमें वे सदैव रहेंगे। और क्या ही अच्छा बदला है अच्छे कर्म करनेवालों का
قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِكُمْ سُنَنٌۙ فَس۪يرُوا فِي الْاَرْضِ فَانْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّب۪ينَ137
तुमसे पहले (धर्मविरोधियों के साथ अल्लाह की) रीति के कितने ही नमूने गुज़र चुके है, तो तुम धरती में चल-फिरकर देखो कि झुठलानेवालों का परिणाम हुआ है
هٰذَا بَيَانٌ لِلنَّاسِ وَهُدًى وَمَوْعِظَةٌ لِلْمُتَّق۪ينَ138
यह लोगों के लिए स्पष्ट बयान और डर रखनेवालों के लिए मार्गदर्शन और उपदेश है
وَلَا تَهِنُوا وَلَا تَحْزَنُوا وَاَنْتُمُ الْاَعْلَوْنَ اِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِن۪ينَ139
हताश न हो और दुखी न हो, यदि तुम ईमानवाले हो, तो तुम्हीं प्रभावी रहोगे
اِنْ يَمْسَسْكُمْ قَرْحٌ فَقَدْ مَسَّ الْقَوْمَ قَرْحٌ مِثْلُهُۜ وَتِلْكَ الْاَيَّامُ نُدَاوِلُهَا بَيْنَ النَّاسِۚ وَلِيَعْلَمَ اللّٰهُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَيَتَّخِذَ مِنْكُمْ شُهَدَٓاءَۜ وَاللّٰهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِم۪ينَۙ140
यदि तुम्हें आघात पहुँचे तो उन लोगों को भी ऐसा ही आघात पहुँच चुका है। ये युद्ध के दिन हैं, जिन्हें हम लोगों के बीच डालते ही रहते है और ऐसा इसलिए हुआ कि अल्लाह ईमानवालों को जान ले और तुममें से कुछ लोगों को गवाह बनाए - और अत्याचारी अल्लाह को प्रिय नहीं है