7. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

7. पृष्ठ
2 · अल-बक़रा
قُلْنَا اهْبِطُوا مِنْهَا جَم۪يعًاۚ فَاِمَّا يَاْتِيَنَّكُمْ مِنّ۪ي هُدًى فَمَنْ تَبِعَ هُدَايَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ38
हमने कहा, "तुम सब यहाँ से उतरो, फिर यदि तुम्हारे पास मेरी ओर से कोई मार्गदर्शन पहुँचे तो जिस किसी ने मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण किया, तो ऐसे लोगों को न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे।"
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَٓا اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ النَّارِۚ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ۟39
और जिन लोगों ने इनकार किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वहीं आग में पड़नेवाले हैं, वे उसमें सदैव रहेंगे
يَا بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ اذْكُرُوا نِعْمَتِيَ الَّت۪ٓي اَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَاَوْفُوا بِعَهْد۪ٓي اُو۫فِ بِعَهْدِكُمْ وَاِيَّايَ فَارْهَبُونِ40
ऐ इसराईल का सन्तान! याद करो मेरे उस अनुग्रह को जो मैंने तुमपर किया था। और मेरी प्रतिज्ञा को पूरा करो, मैं तुमसे की हुई प्रतिज्ञा को पूरा करूँगा और हाँ मुझी से डरो
وَاٰمِنُوا بِمَٓا اَنْزَلْتُ مُصَدِّقًا لِمَا مَعَكُمْ وَلَا تَكُونُٓوا اَوَّلَ كَافِرٍ بِه۪ۖ وَلَا تَشْتَرُوا بِاٰيَات۪ي ثَمَنًا قَل۪يلًاۘ وَاِيَّايَ فَاتَّقُونِ41
और ईमान लाओ उस चीज़ पर जो मैंने उतारी है, जो उसकी पुष्टि में है, जो तुम्हारे पास है, और सबसे पहले तुम ही उसके इनकार करनेवाले न बनो। और मेरी आयतों को थोड़ा मूल्य प्राप्त करने का साधन न बनाओ, मुझसे ही तुम डरो
وَلَا تَلْبِسُوا الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُوا الْحَقَّ وَاَنْتُمْ تَعْلَمُونَ42
और सत्य में असत्य का घाल-मेल न करो और जानते-बुझते सत्य को छिपाओ मत
وَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَ وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِع۪ينَ43
और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो और (मेरे समक्ष) झुकनेवालों के साथ झुको
اَتَاْمُرُونَ النَّاسَ بِالْبِرِّ وَتَنْسَوْنَ اَنْفُسَكُمْ وَاَنْتُمْ تَتْلُونَ الْكِتَابَۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ44
क्या तुम लोगों को तो नेकी और एहसान का उपदेश देते हो और अपने आपको भूल जाते हो, हालाँकि तुम किताब भी पढ़ते हो? फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
وَاسْتَع۪ينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلٰوةِۜ وَاِنَّهَا لَكَب۪يرَةٌ اِلَّا عَلَى الْخَاشِع۪ينَۙ45
धैर्य और नमाज़ से मदद लो, और निस्संदेह यह (नमाज) बहुत कठिन है, किन्तु उन लोगों के लिए नहीं जिनके दिल पिघले हुए हो;
اَلَّذ۪ينَ يَظُنُّونَ اَنَّهُمْ مُلَاقُوا رَبِّهِمْ وَاَنَّهُمْ اِلَيْهِ رَاجِعُونَ۟46
जो समझते है कि उन्हें अपने रब से मिलना हैं और उसी की ओर उन्हें पलटकर जाना है
يَا بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ اذْكُرُوا نِعْمَتِيَ الَّت۪ٓي اَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَاَنّ۪ي فَضَّلْتُكُمْ عَلَى الْعَالَم۪ينَ47
ऐ इसराईल की सन्तान! याद करो मेरे उस अनुग्रह को जो मैंने तुमपर किया और इसे भी कि मैंने तुम्हें सारे संसार पर श्रेष्ठता प्रदान की थी;
وَاتَّقُوا يَوْمًا لَا تَجْز۪ي نَفْسٌ عَنْ نَفْسٍ شَيْـًٔا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا شَفَاعَةٌ وَلَا يُؤْخَذُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَ48
और डरो उस दिन से जब न कोई किसी भी ओर से कुछ तावान भरेगा और न किसी की ओर से कोई सिफ़ारिश ही क़बूल की जाएगी और न किसी की ओर से कोई फ़िद्‌या (अर्थदंड) लिया जाएगा और न वे सहायता ही पा सकेंगे।