70. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

70. पृष्ठ
3 · आले-इमरान
ثُمَّ اَنْزَلَ عَلَيْكُمْ مِنْ بَعْدِ الْغَمِّ اَمَنَةً نُعَاسًا يَغْشٰى طَٓائِفَةً مِنْكُمْۙ وَطَٓائِفَةٌ قَدْ اَهَمَّتْهُمْ اَنْفُسُهُمْ يَظُنُّونَ بِاللّٰهِ غَيْرَ الْحَقِّ ظَنَّ الْجَاهِلِيَّةِۜ يَقُولُونَ هَلْ لَنَا مِنَ الْاَمْرِ مِنْ شَيْءٍۜ قُلْ اِنَّ الْاَمْرَ كُلَّهُ لِلّٰهِۜ يُخْفُونَ ف۪ٓي اَنْفُسِهِمْ مَا لَا يُبْدُونَ لَكَۜ يَقُولُونَ لَوْ كَانَ لَنَا مِنَ الْاَمْرِ شَيْءٌ مَا قُتِلْنَا هٰهُنَاۜ قُلْ لَوْ كُنْتُمْ ف۪ي بُيُوتِكُمْ لَبَرَزَ الَّذ۪ينَ كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقَتْلُ اِلٰى مَضَاجِعِهِمْۚ وَلِيَبْتَلِيَ اللّٰهُ مَا ف۪ي صُدُورِكُمْ وَلِيُمَحِّصَ مَا ف۪ي قُلُوبِكُمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ154
फिर इस शोक के पश्चात उसने तुमपर एक शान्ति उतारी - एक निद्रा, जो तुममें से कुछ लोगों को घेर रही थी और कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें अपने प्राणों की चिन्ता थी। वे अल्लाह के विषय में ऐसा ख़याल कर रहे थे, जो सत्य के सर्वथा प्रतिकूल, अज्ञान (काल) का ख़याल था। वे कहते थे, "इन मामलों में क्या हमारा भी कुछ अधिकार है?" कह दो, "मामले तो सबके सब अल्लाह के (हाथ में) हैं।" वे जो कुछ अपने दिलों में छिपाए रखते है, तुमपर ज़ाहिर नहीं करते। कहते है, "यदि इस मामले में हमारा भी कुछ अधिकार होता तो हम यहाँ मारे न जाते।" कह दो, "यदि तुम अपने घरों में भी होते, तो भी जिन लोगों का क़त्ल होना तय था, वे निकलकर अपने अन्तिम शयन-स्थलों कर पहुँचकर रहते।" और यह इसलिए भी था कि जो कुछ तुम्हारे सीनों में है, अल्लाह उसे परख ले और जो कुछ तुम्हारे दिलों में है उसे साफ़ कर दे। और अल्लाह दिलों का हाल भली-भाँति जानता है
اِنَّ الَّذ۪ينَ تَوَلَّوْا مِنْكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِۙ اِنَّمَا اسْتَزَلَّهُمُ الشَّيْطَانُ بِبَعْضِ مَا كَسَبُواۚ وَلَقَدْ عَفَا اللّٰهُ عَنْهُمْۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ حَل۪يمٌ۟155
तुममें से जो लोग दोनों गिरोहों की मुठभेड़ के दिन पीठ दिखा गए, उन्हें तो शैतान ही ने उनकी कुछ कमाई (कर्म) का कारण विचलित कर दिया था। और अल्लाह तो उन्हें क्षमा कर चुका है। निस्संदेह अल्लाह बड़ा क्षमा करनेवाला, सहनशील है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَكُونُوا كَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَقَالُوا لِاِخْوَانِهِمْ اِذَا ضَرَبُوا فِي الْاَرْضِ اَوْ كَانُوا غُزًّى لَوْ كَانُوا عِنْدَنَا مَا مَاتُوا وَمَا قُتِلُواۚ لِيَجْعَلَ اللّٰهُ ذٰلِكَ حَسْرَةً ف۪ي قُلُوبِهِمْۜ وَاللّٰهُ يُحْي۪ وَيُم۪يتُۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ156
ऐ ईमान लानेवालो! उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने इनकार किया और अपने भाईयों के विषय में, जबकि वे सफ़र में गए हों या युद्ध में हो (और उनकी वहाँ मृत्यु हो जाए तो) कहते है, "यदि वे हमारे पास होते तो न मरते और न क़त्ल होते।" (ऐसी बातें तो इसलिए होती है) ताकि अल्लाह उनको उनके दिलों में घर करनेवाला पछतावा और सन्ताप बना दे। अल्लाह ही जीवन प्रदान करने और मृत्यु देनेवाला है। और तुम जो कुछ भी कर रहे हो वह अल्लाह की स्पष्ट में है
وَلَئِنْ قُتِلْتُمْ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ اَوْ مُتُّمْ لَمَغْفِرَةٌ مِنَ اللّٰهِ وَرَحْمَةٌ خَيْرٌ مِمَّا يَجْمَعُونَ157
और यदि तुम अल्लाह के मार्ग में मारे गए या मर गए, तो अल्लाह का क्षमादान और उसकी दयालुता तो उससे कहीं उत्तम है, जिसके बटोरने में वे लगे हुए है