71. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
3 · आले-इमरान
وَلَئِنْ مُتُّمْ اَوْ قُتِلْتُمْ لَاِلَى اللّٰهِ تُحْشَرُونَ158
हाँ, यदि तुम मर गए या मारे गए, तो प्रत्येक दशा में तुम अल्लाह ही के पास इकट्ठा किए जाओगे
فَبِمَا رَحْمَةٍ مِنَ اللّٰهِ لِنْتَ لَهُمْۚ وَلَوْ كُنْتَ فَظًّا غَل۪يظَ الْقَلْبِ لَانْفَضُّوا مِنْ حَوْلِكَۖ فَاعْفُ عَنْهُمْ وَاسْتَغْفِرْ لَهُمْ وَشَاوِرْهُمْ فِي الْاَمْرِۚ فَاِذَا عَزَمْتَ فَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُتَوَكِّل۪ينَ159
(तुमने तो अपनी दयालुता से उन्हें क्षमा कर दिया) तो अल्लाह की ओर से ही बड़ी दयालुता है जिसके कारण तुम उनके लिए नर्म रहे हो, यदि कहीं तुम स्वभाव के क्रूर और कठोर हृदय होते तो ये सब तुम्हारे पास से छँट जाते। अतः उन्हें क्षमा कर दो और उनके लिए क्षमा की प्रार्थना करो। और मामलों में उनसे परामर्श कर लिया करो। फिर जब तुम्हारे संकल्प किसी सम्मति पर सुदृढ़ हो जाएँ तो अल्लाह पर भरोसा करो। निस्संदेह अल्लाह को वे लोग प्रिय है जो उसपर भरोसा करते है
اِنْ يَنْصُرْكُمُ اللّٰهُ فَلَا غَالِبَ لَكُمْۚ وَاِنْ يَخْذُلْكُمْ فَمَنْ ذَا الَّذ۪ي يَنْصُرُكُمْ مِنْ بَعْدِه۪ۜ وَعَلَى اللّٰهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ160
यदि अल्लाह तुम्हारी सहायता करे, तो कोई तुमपर प्रभावी नहीं हो सकता। और यदि वह तुम्हें छोड़ दे, तो फिर कौन हो जो उसके पश्चात तुम्हारी सहायता कर सके। अतः ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा रखना चाहिए
وَمَا كَانَ لِنَبِيٍّ اَنْ يَغُلَّۜ وَمَنْ يَغْلُلْ يَاْتِ بِمَا غَلَّ يَوْمَ الْقِيٰمَةِۚ ثُمَّ تُوَفّٰى كُلُّ نَفْسٍ مَا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ161
यह किसी नबी के लिए सम्भब नहीं कि वह दिल में कीना-कपट रखे, और जो कोई कीना-कपट रखेगा तो वह क़ियामत के दिन अपने द्वेष समेत हाज़िर होगा। और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी कमाई का पूरा-पूरा बदला दे दिया जाएँगा और उनपर कुछ भी ज़ुल्म न होगा
اَفَمَنِ اتَّبَعَ رِضْوَانَ اللّٰهِ كَمَنْ بَٓاءَ بِسَخَطٍ مِنَ اللّٰهِ وَمَاْوٰيهُ جَهَنَّمُۜ وَبِئْسَ الْمَص۪يرُ162
भला क्या जो व्यक्ति अल्लाह की इच्छा पर चले वह उस जैसा हो सकता है जो अल्लाह के प्रकोप का भागी हो चुका हो और जिसका ठिकाना जहन्नम है? और वह क्या ही बुरा ठिकाना है
هُمْ دَرَجَاتٌ عِنْدَ اللّٰهِۜ وَاللّٰهُ بَص۪يرٌ بِمَا يَعْمَلُونَ۟163
अल्लाह के यहाँ उनके विभिन्न दर्जे है और जो कुछ वे कर रहे है, अल्लाह की स्पष्ट में है
لَقَدْ مَنَّ اللّٰهُ عَلَى الْمُؤْمِن۪ينَ اِذْ بَعَثَ ف۪يهِمْ رَسُولًا مِنْ اَنْفُسِهِمْ يَتْلُوا عَلَيْهِمْ اٰيَاتِه۪ وَيُزَكّ۪يهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَۚ وَاِنْ كَانُوا مِنْ قَبْلُ لَف۪ي ضَلَالٍ مُب۪ينٍ164
निस्संदेह अल्लाह ने ईमानवालों पर बड़ा उपकार किया, जबकि स्वयं उन्हीं में से एक ऐसा रसूल उठाया जो उन्हें आयतें सुनाता है और उन्हें निखारता है, और उन्हें किताब और हिक़मत (तत्वदर्शिता) का शिक्षा देता है, अन्यथा इससे पहले वे लोग खुली गुमराही में पड़े हुए थे
اَوَلَمَّٓا اَصَابَتْكُمْ مُص۪يبَةٌ قَدْ اَصَبْتُمْ مِثْلَيْهَاۙ قُلْتُمْ اَنّٰى هٰذَاۜ قُلْ هُوَ مِنْ عِنْدِ اَنْفُسِكُمْۜ اِنَّ اللّٰهَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ165
यह क्या कि जब तुम्हें एक मुसीबत पहुँची, जिसकी दोगुनी तुमने पहुँचाए, तो तुम कहने लगे कि, "यह कहाँ से आ गई?" कह दो, "यह तो तुम्हारी अपनी ओर से है, अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।"